Saturday, December 31, 2011

भ्रष्टाचार पर अरण्य रोदन के विषय में

बात भ्रष्टाचार की खूब चल रही है, नित नये सु/कुविचार और सु/कुतर्क भी सुनने को मिलते हैं. एक और भी विचार आजकल चलन/फैशन में है, जिसे हमारे यहां के बुद्धिजीवी ब्लाग/सोशल साइट्स और अखबारों में निरन्तर प्रकाशित कर/करवा रहे हैं. वह है कि भ्रष्टाचार के लिये भ्रष्टाचार मिटाने के लिये आम आदमी को आगे आना चाहिये और उसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ना चाहिये, भ्रष्टाचारी भी समाज का अंग हैं, उनका बहिष्कार होना चाहिये. यदि आप घूस देंगे नहीं तो लेने वाले को मिलेगी कैसे और आप स्वयं क्या करते हैं, नक्शे में कुछ और दिखाया जाता है, बनाया कुछ और जाता है, रजिस्ट्री कराते समय स्टाम्प कम लगे, इसलिये आप कम दाम दिखाते हैं, या फिर रेलयात्रा में सीट पाने के लिये, वगैरा वगैरा. इसमें सारी बातें सही हैं और मैं इससे सहमत भी हूं, लेकिन मैं उनके इस विचार से कतई इत्तफाक नहीं रखता कि भ्रष्टाचार इसलिये बढ़ रहा है कि आम आदमी ऊपर लिखी गयी तथा इसके अतिरिक्त इसी प्रकार की और गलत चीजों को अपनाता है तथा बढ़ावा देता है.

जैसा कि मैंने पाया है कि आम आदमी खुशी खुशी भ्रष्ट आचरण को बढ़ावा तब देता है जब वह स्वयं अवैधानिक कार्य करता है जिसमें ऊपर लिखी हुई सारी बातें शामिल हैं. लेकिन जहाँ पूरा सिस्टम ही ऐसा बनाकर रख दिया गया हो जिसमें पैदा होने के प्रमाणपत्र  से लेकर मरने के सर्टीफिकेट बनवाने तक पैसा देना पड़े तो कौन सा ऐसा व्यक्ति होगा (अपवाद छोड़कर-जिसमें समाज के बहुत ताकतवर व्यक्ति आते हैं) जो इस कुचक्र से बच सकता है. रेलवे में रिजर्वेशन को लेकर अक्सर बड़ी बड़ी बहसें छिड जाती हैं कि आम आदमी सीट की प्राप्ति के लिए किस तरह से भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है. मान लीजिए कि टीटी के पास दो सीटें उपलब्ध हैं और जाने वाले आठ लोग मौजूद हैं. टीटी किसे प्राथमिकता देगा, जिससे उसे कुछ लाभ होगा (यदि टीटी उस प्रकार का है तब). अब इस स्थिति में आठों लोग ही प्रयासरत होते हैं कि कैसे भी एक सीट हासिल हो जाये. अमूमन यह होता है कि टीटी के पास जायें तो वह सीट उपलब्ध होने पर भी मना कर देता है और जाहिर है कि आम आदमी के पास यह सूचना नहीं होती कि यह बात सत्य है या नहीं. और जहाँ कोई आदमी अपने स्वार्थों की पूर्ति हेतु भ्रष्टाचार करने पर आमादा होता है वहाँ भी यह जिम्मेदारी शासन की होती है जिसके लोगों को अपने काम करने के लिए वेतन दिया जाता है और उनकी जिम्मेदारी बनती है जिनके कन्धों पर गलत कार्य-व्यवहार रोकने के लिए नियुक्त किया जाता है.

थोड़ी-बहुत देर बाद  लोग आगे पीछे घूमते हैं तो यह देखा जाता है कि कौन सा व्यक्ति मतलब का है. अब जो व्यक्ति मतलब का है उसे आश्वासन दे दिया जाता है और बाद में सीट भी. मान लीजिए कि जो व्यक्ति सबसे पहले आया था और उस व्यक्ति को सीट न देकर बाद में आने वाले व्यक्ति को सीट दे दी गयी तो फिर ऐसे में एक ईमानदार व्यक्ति को क्या हासिल हुआ. कुछ नहीं. लोग इस पर कहते हैं कि भैया ऐसे मामलों में शिकायत करो. किससे करो? और उसका नतीजा क्या? पहली बात यह कि जिसे आवश्यकता थी और जो हक़दार था उसे सीट नहीं मिली. अब शिकायत करने के लिए अपनी जेब से बीस-तीस रुपये खर्च करो और फिर इन शिकायतों का क्या अंजाम होता है, सब जानते हैं. चूँकि इस प्रकार की शिकायतों पर यदि तुरंत कार्रवाई हो तभी कुछ सार्थक घटित हो सकता है. अब यदि व्यक्ति की रेल का समय रात का है ऐसे समय में शिकायत कौन सुनेगा जब कि सामान्य समय में भी शिकायतों पर कार्रवाई नहीं हो पाती.

कहीं दिक्कत संसाधनों को लेकर भी होती है. और जाहिर है कि किसी भी सरकार के लिए सबसे अच्छा बचाव हो सकता है कि हमारे पास संसाधन नहीं हैं. जिस प्रकार से जनसँख्या अबाध गति से बढती जा रही है, उस हिसाब से तो कभी भी संसाधन पर्याप्त नहीं हो सकते. जनसँख्या वृद्धि->मंहगाई->भ्रष्टाचार यह सभी एक ही चक्र में समाहित हैं और एक दूसरे का कारक और कारण भी हैं. और भारत के भोले भाले लोग सियासतदानों की इन चालाकियों को समझ नहीं पाते. उन्हें इसीलिए इस चक्र में उलझाया गया है कि सुबह से शाम तक पेट भरने की ही जुगत में लगे रहें. जब दिन भर इसी में लगे रहेंगे तो और किसी चीज पर निगाह डालने का समय ही नहीं मिलेगा और फिर इन कुचर्कों में यूँ ही फँसे रहेंगे.

लोग यह भी कहते हैं कि लोकपाल के लिए कुंदन जैसा व्यक्ति कहाँ से आएगा. हमारे यहाँ तमाम संवैधानिक संस्थान हैं, न्यायपालिका है जिनमें तमाम उच्च नैतिक मानदंड अपनाने वाले लोग हुए हैं. आखिर वे भी तो यहीं से आये हैं. और फिर यदि यही माना जाए कि एक व्यक्ति भी कुंदन की तरह खरा नहीं मिल सकता तो फिर तमाम सरकारी-निजी-गैर सरकारी संस्थाओं में बैठे लोग सब के सब गलत हैं. कदापि नहीं. जाने कितने लोग हैं जो आज भी पूरे ईमानदार हैं, और जो व्यक्ति ७०-८०-९० प्रतिशत भी ईमानदार है उसे सौ प्रतिशत में बदलते देर नहीं लगती. ऐसे भी लोग हैं जो पैसा लेते नहीं लेकिन उन्हें कहीं न कहीं देना पड़ जाता है तो इस तरह के लोगों को आप भ्रष्ट नहीं कह सकते. न जाने कितने महकमे ऐसे हैं जहाँ तबादले को उद्योग बना दिया गया है. और फिर इसे भ्रष्टाचार क्यों नहीं माना जाता कि कुछ पैसे वाले लोग तमाम संसाधनों पर कब्ज़ा कर लेते हैं और फिर उनकी मनमानी कीमत वसूल करते हैं. रियल एस्टेट में जाकर देखिये कि किस तरह किसानों की जमीन निहायत कम दामों पर खरीद ली जाती है और फिर मन-माने दामों में बेची जाती है. चीनी और अरहर का मामला सामने है जहाँ इसका स्टॉक कर लिया गया और फिर अंधाधुंध दामों पर ये वस्तुएँ बेची गयीं.

चतुर लोग माहौल को ऐसा बना देते हैं कि तन-मन-धन लुटा देने वाला आम आदमी स्वयं को ही भ्रष्टाचार का जनक मानने लगता है.  अगर भ्रष्टाचार को रोकने में कठिनाई आ रही है तो फिर ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा रही जिससे कि अवैध कमाई करने वाला उसे खर्च न कर सके. जब अवैध रूप से कमाया गया धन व्यय ही नहीं किया जा सकेगा तो फिर उसे कमाएगा कौन और क्यों. यह मानना ही पड़ेगा कि देश में अप्रत्याशित रूप से बढ़ी महँगाई के पीछे भी यही काला धन है. लेकिन संसद में क्या हुआ सब के सामने आ चुका है. श्रीमान राम जेठमलानी जी के भाषण में जो विषय उठाये गए वे बहुत महत्वपूर्ण थे लेकिन!

Sunday, December 18, 2011

भोपाल में कुपोषण से बच्ची की मौत - दोषी कौन?

भोपाल में एक बच्ची की मौत कुपोषण अर्थात भूख के चलते हो गई. खबर के मुताबिक इस दो वर्षीय बच्ची के माँ-बाप श्रमिक थे. बच्ची बीमार हुई, उसे लेकर अस्पताल पहुंचे,जहाँ उसकी मौत हो गयी.जैसे कि हमेशा होता आया है कि इस देश में भूख से कोई नहीं मरता, इसकी मौत के कारण को सुनिश्चित करने के लिए पोस्ट-मार्टम कराया गया और जिसमें यह पाया गया कि उसके सीने और दिल में चोट पाई गयी. और फिर उस बच्ची के माँ-बाप के विरुद्ध मुक़दमा लिख दिया गया-गैर इरादतन हत्या का.  
क्या कोई माँ-बाप इतने निष्ठुर हो सकते हैं कि पैदा करने के दो साल बाद तक उसे पालने के बाद अपनी बेटी को मार दें, भले भूखा रखकर ही सही. ऊपर से ताज्जुब यह कि बच्ची की मृत्यु जून में हुई थी और मुक़दमा अब दर्ज हुआ है. हम थोथी नैतिकता की दुहाई देने वाले लोग, धिक्कार है हम पर. सबसे अधिक गुस्सा आता है मुझे उन सरकारी लोगों पर, जो जब तक लाइन के इस पार खड़े होते हैं, उनके अंदर संवेदनाओं का समुद्र हिलोरें लेता रहता है, लेकिन लाइन के उस पार पहुंचते ही उनकी आँखे मुंद जातीं हैं, वह संवेदनाओं का समुद्र सूखकर एक मरुभूमि में बदल जाता है.
लोग चिल्ला रहे हैं कि नई पीढ़ी आ रही है, उससे बहुत उम्मीदें हैं. तो भैया यह भी बताओ कि कौन सी पीढ़ी सीधे बूढी ही पैदा हुई थी. जो आज बूढ़े हैं, वे कल युवा थे, जो आज युवा हैं, वे कल बूढ़े होंगे. ये दौर यूं ही चलेगा. निराश होना अच्छा नहीं, लेकिन रोशनी कहीं नहीं. समाज बदलने के लिए सोच का होना आवश्यक है, लोग समग्र को नहीं देखते, केवल स्व तक सीमित हैं और इसी सोच के चलते सैकड़ों साल गुलाम रहे. सोच आये कहाँ से, जब कि शिक्षित न हों. और ये इंतजाम पहले ही पुख्ता हैं कि आप डिग्री तो ले लें, लेकिन शिक्षित न हो सकें. इतिहास पहले से ही दूसरों के चश्मे से देखकर लिखा हुआ पढाया जा रहा है, तो कहाँ से नींव मिले और खोखले आधारों पर कभी भी मजबूत इमारत नहीं बन सकती. 

Friday, December 9, 2011

कई महीनो के बाद अपने अकाउंट में लाग-इन !

आज मैं कई महीनो के बाद अपने अकाउंट को लाग-इन कर सका. ubuntu linux को इन्स्टाल कर लिया है. 3G मोडेम बढ़िया कार्य कर रहा है. लेकिन एक दो कठिनाईयां हैं. पहला कि बराहा को कैसे इन्स्टाल किया जाए जिससे कि मैं रोमन में टाइप कर हिंदी लिख सकूं तथा दूसरा यह कि skpye किस तरह से इन्स्टाल हो गया और इसमें usb वेब-कैम कैसे इन्स्टाल हो सकेगा.  

Monday, September 12, 2011

मेरे सिस्टम में वायरस आ गया है.............

पिछले दिनों एक साइट नहीं खुल रही थी, उसे खोलने के लिये फायरबाल को डी-एक्टीवेट क्या किया, मानो आफत आ गयी. दोबारा वह फायरबाल एनेबल नहीं हुई. अन्दर सिस्टम में देखा तो हिडन फाइलें दिखना बन्द हो गयीं. फिर "हिडन फाइलें" दिखाने वाला आप्शन क्लिक किया तब वह फाइलें दिखाई दीं, लेकिन अगले क्षण फिर वही पुरानी स्थिति.
इसमें होता यह है कि एक "autorun.inf" फाइल बनती है जो एक बार तो डिलीट हो जाती है, लेकिन दोबारा डिलीट नहीं होती. इसके अन्दर जो प्रोग्राम होता है वह एक रैन्डम फाइल बनाता है जिसका एक्स्टेंशन ".pif" या ".exe" होता है. मैं अपने सिस्टम  की C Drive को कई बार फार्मेट कर विन्डोज इन्स्टाल कर चुका हूं, लेकिन यह वायरस मंहगाई की भांति पीछा ही नहीं छोड़ रहा.

अवीरा स्कैन करने पर कई ठीक ठाक फाइलों को वायरस युक्त बताकर तुरन्त उड़ा देता है. और अवास्त का भी यही हाल है. वह फाइलों को अपने वाल्ट में भेज देता है. मालवेयर बाइट्स वायरस को अन्य फाइलों तक पहुंचने से तो रोकता है लेकिन इस वायरस  को खत्म नहीं करता. पता नहीं यह मुआ कहां छुप जाता है तिलचट्टे की भांति. स्पाइबोट - सर्च एन्ड डेस्ट्रोय तो इन्स्टाल ही नहीं हो पाया इस वायरस के चलते.

एक स्थान पर पाया कि इसका नाम Malware.Packer.Gen है तो अन्य स्थान पर यह win32.sality के नाम से प्रसिद्ध है. कैसे इसका आक्रमण बन्द हो. कुछ सुझाइये.

Sunday, September 11, 2011

हमारे प्रधान जी एकदम ठीक कर रहे हैं.

एक बम क्या फट गया, मानों आफत आ गयी. जिसे देखो वही कट्टरपंथियों के हाथों खेलने लगा और अपनी भड़ास उतारने लगा. लेकिन मैं प्रधान जी के साथ हूं. वह हमारे देश के गौरवशाली अतीत और परम्पराओं का निर्वहन कर रहे हैं. विश्वास नहीं होता. अब देखिये, हमारे ही बड़े बूढ़े कह गये हैं कि गोली के घाव से भी अधिक तीखा होता है बोली का घाव. इसीलिये आतंक और आतंकवादियों तथा उनके मददगारों के विरुद्ध बोली का प्रयोग कर रहे हैं. बिल्कुल छलनी हो जायेंगे हमारे बयानों से. और हम आतंकवादियों को कोस भी तो रहे हैं. जब मरी खाल की श्वांस से लोहा भी भस्म हो जाता है तो हमारी आहों से ये आतंकवादी कैसे बच जायेंगे. रोज करें ऐसी कायराना हरकत. हम इन कायराना हरकतों से डरते नहीं हैं, देखा दिल्ली कहीं रुकी, मुम्बई कहीं रुकी. ये है हमारी जिन्दादिली.  बयान संप्रेक्षण चालू आहे.

Sunday, August 28, 2011

डा० अमर कुमार और शम्मी कपूर - अब स्वर्गीय.

कल बन्धु श्री अनुराग शर्मा जी के फेसबुक अपडेट से पता चला कि डा०अमर नहीं रहे. बड़ा धक्का लगा. कुछ समय से रोग-ग्रसित थे किन्तु इसके बावजूद उनकी जिन्दादिली में कोई कमी नहीं आई थी. इटैलिक्स में लिखी उनकी टिप्पणियां जिसमें कभी भोजपुरी तो कभी पंजाबी और कभी अंग्रेजी का शानदार तड़का लगा होता था, सत्य को प्रतिबिम्बित करती थीं. माडरेशन के विरुद्ध रहे और अपनी बात को पूरी दृढ़ता से सामने रखते रहे. साहसी, निर्भय, लाग-लपेट से दूर, जैसा कि मैंने हमेशा पाया. एक-दम खरी बात कहने और सुनने के आदी. बहुत धारदार लेखन. पैना, जीवंत, जब व्यंग्य करते, तो सामने वाले को उसकी तीक्ष्णता का अहसास होता.  बहुत कुछ लिखने के लिये बैठा था, लेकिन न लिख सका. आपकी बहुत आवश्यकता थी हमें, लेकिन लगता है कि हमसे अधिक आवश्यकता ईश्वर को थी. आपको नमन.


इससे कुछ दिनों पहले शम्मी कपूर के निधन की खबर पढ़ी.  बहुत छोटा था तो शायद जंगली देखी थी, श्वेत - श्याम टेलीविजन पर. उसका गीत "चाहे कोई मुझे जंगली कहे" जुबान पर चढ़ गया था. शम्मी जी को पर्दे पर देखता तो लगता कि काश मैं भी ऐसा बन सकूं, हर समय ऊर्जा से ओत-प्रोत युवक. मानो उनके अन्दर कोई ऐसी बैटरी लगी थी जो हर समय ही फुल चार्ज्ड रहती. आखिर कोई व्यक्ति कैसे इतना ऊर्जावान, इतना मस्त हो सकता है.  बाद में यह समझ में आया कि पर्दे पर तो एक कैरेक्टर प्ले करना पड़ता है अभिनेता को. उसके बाद भी मेरे मन से वह छवि कभी विखंडित नहीं हुई. बल्कि उस छवि से मैं निरन्तर ऊर्जा प्राप्त करता रहा. पत्र - पत्रिकाओं से पता चलता रहा कि शम्मी जी कभी रिटायर नहीं हुये, बल्कि हमेशा अपने लिये नये जमाने के साथ जोड़े रहे. मृत्यु एक अटल सत्य है. समय के इस दरिया में न जाने कितने लोग प्रवाहित हो गये और रह गयीं तो सिर्फ यादें.

Saturday, August 13, 2011

पिछले दिनों जिन चीजों ने झकझोरा

उत्तर प्रदेश में भूमि अधिग्रहण  व्यवस्था में संशोधन कर दिया गया है, अब सरकार जिस  जमीन को अधिग्रहीत कर लेगी उसे कभी वापस नहीं किया जा सकेगा, फिर वह जमीन वर्षों तक बेकार ही क्यों न पड़ी रहे. विपक्ष अब चिल्ला  रहा है कि कैसा संशोधन पारित हो गया.

कांवरिये बरसों से जिस  मार्ग से निकलते आते रहे हैं, उस इलाके में अल्पसंख्यकों (मुस्लिमों) की  संख्या  बढ़ जाए तो फिर कांवरियों के  निकलने से भावनाएं आहत होती हैं, किन्तु हिन्दुओं की अधिकता वाले  इलाकों में निर्धारित  मार्ग से ताजियों के निकलने से हिन्दुओं को कोई परेशानी नहीं होती.

एक पत्रकार कह रहे हैं कि अन्ना ने चार लाख फ़ार्म बांटे, लेकिन अस्सी हजार वापस मिले अर्थात  लोगों ने अन्ना को नकार दिया. मुझे नहीं लगता कि यही बात वे हमारे चुने गए जन-प्रतिनिधियों के बारे में लिखेंगे. आखिर चालीस- पचास  प्रतिशत लोग किसी को वोट नहीं  देते और जीतने वाला कुल मतों का बीस - पच्चीस प्रतिशत पाकर जीत जाता है तो फिर ये भी तो नकारे हुए हैं.

आरक्षण फ़िल्म को देखे बिना ही विवादित बना दिया गया है. इस फ़िल्म से आरक्षण पर कोई प्रभाव पड़ेगा, नहीं लगता. लेकिन नेता हैं कि दलितों का सबसे बड़ा हितैषी दिखने के लिए फ़िल्म का विरोध करने पर उतारू हैं. आरक्षण की इस व्यवस्था में  अल्पसंख्यकों को लाने से क्या प्रभाव पड़ेगा, उस पर ध्यान देने की आवश्यकता है. अब इस फ़िल्म में क्या है, देखने से ही पता चलेगा.

कश्मीर के अलगाव-वादी नेता (?)  अब तय करेंगे कि किसे  फाँसी हो  और किसे नहीं,  मीर वाइज उमर ने  एक बयान में कहा है कि अफजल को फाँसी होने पर परिणाम गंभीर होंगे.  मतलब भारत की सर्वोच्च संस्था पर हमला करने वाले को इसलिए फांसी न दी जाए कि मीर वाइज की ऐसी ही मर्जी है. ये तो राष्ट्रपति और संसद से भी बड़े हो गए. 

लखनऊ में  एक चाय वाले को एक मुस्लिम बच्चा मिला, जिसे उसने पाला-पोसा और मुस्लिम नाम ही रखा रहने दिया. उसने उस बच्चे के माँ-बाप को खोजा किन्तु वे नहीं मिले. कई वर्षों बाद उसकी माँ को पता   चला और अब उसने एक दलील यह भी दी है कि उस बच्चे को हिन्दू के यहाँ रहने पर सांप्रदायिक तनाव भी हो सकता है.

राहुल भैया, महाराष्ट्र के किसानों की छाती पर गोलियां चली हैं. उनपर भी नजर डालिए. वहां भी किसान मरे हैं, वे किसान जो सर्दी-गर्मी-बरसात झेलकर हमारा पेट भरते हैं.

Thursday, July 21, 2011

सिलीगुड़ी में तेंदुआ

खबर पढ़ रहा था कि सिलीगुड़ी में एक तेंदुआ जंगलों से भटककर आ गया. इसी प्रकार मध्यप्रदेश के मुख्यमन्त्री के निवास के पास भी एक तेंदुआ पकड़ा गया. महाराष्ट्र में भी ऐसी कई घटनायें हुई हैं. कारण है कि भारत में मनुष्यों की आबादी तेजी से बढ़वाई जा रही है, जिन्हें रहने के लिये घर चाहिये तो उसके लिये खेतों का नाश किया जाता है और जब खाना चाहिये तो जंगल काटकर खेत बनाये जाते हैं.  अब ऐसे पशु-पक्षी कहां जायें जिनका गुजारा ही जंगलों से होना है, नतीजा होता है कि वे कभी-कभी शहरों की तरफ आ जाते हैं और फिर जो सौभाग्यशाली होते हैं, वे पकड़ लिये जाते हैं जीवित. तथा जिनका भाग्य अच्छा नहीं होता वे सिलीगुड़ी वाले तेंदुये की तरह मारे जाते हैं. इतने बड़े देश में आजादी के चौंसठ साल बाद भी हमारे पास ऐसे प्रशिक्षित कर्मी नहीं हैं जो एक तेंदुये पर उचित मात्रा में ट्रैक्वलाइजर का प्रयोग कर उसे बेहोश कर पकड़ सकें. मैं अभी चित्र देख रहा था जहां उस पर बंदूकों से ऐसे हमला किया जा रहा था वैसा तो किसी आतंकवादी पर भी नहीं किया जाता होगा. मैं तो उन लोगों को धन्य कहता हूं जो विदेशी हैं किन्तु मानवीय जानों के साथ, अन्य प्राणियों की जानों की रक्षा के लिये भी उसी तत्परता से आतुर रहते हैं. डिस्कवरी पर एक प्रोग्राम देख रहा था व्हेल मछलियों को बचाने वाले लोगों के ऊपर, जो लगातार कई वर्षों से व्हेल के शिकारियों को रोकने के लिये स्वत: आगे आकर कार्य कर रहे हैं. लेकिन जिस देश में आदमी की जान का कोई मोल नहीं, वहां एक जानवर की जान का मोल क्या होगा. चीते की तरह ही सारे जानवर भारत से विलुप्त हो जायेंगे और उस दिन बचेगा तो सिर्फ मानवीय अस्तित्व धारी एक प्राणी जिसे इंसान कहना शायद ही मुमकिन होगा.

Tuesday, July 19, 2011

इस्लाम तो शांति का उपदेश देता है लेकिन उसके ये तथाकथित अनुयायी!

एक और दिल दहला देने वाला वीडियो लाइवलीक डाट काम पर आया है जिसमें पाकिस्तान के स्वात में तालिबानियों ने सुरक्षा-कर्मियों पर छ: बच्चों की हत्या का आरोप लगाते हुये सोलह सुरक्षा-कर्मियों को मौत के घाट उतार दिया.  मारने वाले और मरने वाले दोनों ही मुसलमान हैं. अल्लाह को मानने वाले और अल्लाह के बंदे. बेशक इस्लाम शांति का संदेश देता होगा, किन्तु उसके अनुयायियों की करतूतें तो ऐसी हैं कि मानवता को शर्मसार कर दें.  यह कैसा न्याय है कि सामने वाले को अपना पक्ष तक एक निष्पक्ष अदालत के, जज के सामने रखने का मौका तक न दिया जाये और  फिर जल्लाद ही जज बनकर फैसला सुना दे. ये तालिबानी तो स्वयं ही ख़ुदा बन बैठे. अगर इन्हें ही बिना किसी सुनवाई के फैसला देने का अधिकार है तो निश्चित रूप से फिर किसी कानून-किसी पुस्तक की आवश्यकता रही ही नहीं. तब फिर अल्लाह के बन्दे होने का दिखावा क्यों. भयावह बात यह है कि भारत में भी इस प्रकार की मानसिकता वाले तत्वों की कमी नहीं, जो गाहे-बगाहे यहां पर शरीयत के अनुसार सभी फैसले कराने की मांग करते हैं और कई बार तो इन फैसलों और अदालतों को कानूनी जामा पहनाने की बात करते हैं. ऊपर से हमारे यहां के राजनीतिबाज वोटों की राजनीति के चलते इस मानसिकता को दबाने के स्थान पर उभारने में लगे रहते हैं. ऐसे में अल्लाह ही इन्हें सद्बुद्धि दे.

Monday, July 18, 2011

किस प्रकार पाकिस्तान के मुस्लिम संगठन दूसरे धर्मों का सम्मान करते है - एक उदाहरण

कुछ मुस्लिम संगठनों ने लाहौर में सिखों को उनके धार्मिक समारोह करने से रोक दिया और दावत-ए-इस्लामी नामक समूह के प्रयासों से सिखों के वाद्य यन्त्रों को उठाकर फेंक दिया. पूरी खबर यहां है.
"लाहौर में सिखों को नहीं करने दिया धार्मिक समारोह इस्लामाबाद, प्रेट्र : पाकिस्तान में लाहौर के पूर्वी क्षेत्र में सिखों को एक गुरुद्वारे में धार्मिक समारोह आयोजित करने से रोक दिया गया है। यह फैसला प्रशासन ने एक संगठन द्वारा यह यकीन दिलाने के बाद किया कि मुस्लिम त्योहार शब-ए-बरात सिखों के त्योहार से ज्यादा महत्वपूर्ण है। द ट्रिब्यून अखबार के मुताबिक, दावत-ए-इस्लामी समूह के प्रयासों से 13 जुलाई को सिखों के वाद्य यंत्रों को बाहर फेंक दिया गया और गुरुद्वारे में उनका प्रवेश वर्जित कर दिया गया। गुरुद्वारे के बाहर पुलिस को तैनात किया गया, ताकि वह सिखों को अपना धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करने से रोके। सोमवार को शब-ए-बरात है। लाहौर के नौलखा बाजार में गुरुद्वारा शहीद भाई तारू सिंह सिख संत की याद में बनवाया गया था। हालांकि विभाजन के बाद गुरुद्वारे पर इवैक्यूइ ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (इटीपीबी) का अधिकार हो गया था और सिखों को कुछ प्रतिबंधों के साथ इसका उपयोग जारी रखने की अनुमति दे दी गई थी। चार साल पहले दावत-ए-इस्लामी ने दावा किया था कि यह गुरुद्वारा 15वीं शताब्दी के मुस्लिम संत पीर शाह काकू की मजार पर बनाया गया है। इसके बाद सिखों ने इटीपीबी से संपर्क किया, जो दोनों समुदायों को अपनी मान्यताओं के अनुसार गुरुद्वारे में धार्मिक उत्सव मनाने की अनुमति देती है।"
अब यदि इस्लाम और कुरान तथा अन्य मुस्लिम धर्म-ग्रन्थ दूसरे धर्मानुयायियों के साथ भेद-भाव की इजाजत नहीं देते, मजहब के आधार पर किसी अन्य व्यक्ति या मजहब पर अत्याचार की इजाजत नहीं देते तो फिर ये किस प्रकार की गैर-इस्लामी हरकते हैं और कौन लोग इन्हें अंजाम दे रहे हैं. तथा ऐसे संगठनों और इनसे जुड़े लोगों के खिलाफ मजहबी नेता फतवे जारी क्यों नहीं करते. कहीं ऐसा तो नहीं कि इनके पैमाने भी अलग-अलग हों और समानता की, न्याय की, सभी को एक बराबर मानने की बातें मात्र दिखावा करने भर को की जाती हों इन लोगों के द्वारा.

Thursday, July 14, 2011

चलिये एक बार फिर से मोमबत्तियां जलायें.

जी हां, घर से निकलिये हाथ में मोमबत्तियां लेकर. कल चौराहे पर जलाकर विरोध प्रदर्शित कीजिये. अखबार और टीवी में बयान पढ़िये कि फलां-फलां लोग हमारी सहनशक्ति की परीक्षा न ले. आतंकियों का कोई धर्म नहीं होता. आतंकवादियों से सख्ती से निपटा जायेगा. शायद मरने वालों और घायलों को मुआवजे की घोषणा भी हो गयी होगी. और कुछ राजनीतिबाज, कुछ सिकलुरिस्टों के बयान का इन्तजार कीजिये कि इसमें हिन्दू आतंकवादियों का हाथ हो सकता है क्योंकि उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं और उसके बाद फिर लोकसभा के भी २०१४ में चुनाव होंगे, इसलिये साम्प्रदायिक ताकतें ऐसा कर रही हैं और इसकी न्यायिक जांच होना चाहिये.
इन राजनीतिबाजों, सोते हुये असहाय लोगों पर डन्डा चलाने के आदेश देने वालों के सगे-सम्बन्धी इन हमलों के दायरे में नहीं आते इसलिये इनके सीने में दर्द नहीं होता और यहां का आम आदमी विलक्षण है. मरता रहेगा लेकिन घर से बाहर नहीं निकलेगा. वह यह भूल जाता है कि जो बम मुम्बई में फट रहा है, वह उसके शहर में, उसकी गली में, उसके घर के बाहर भी फट सकता है और उसके सगे-सम्बन्धी भी ऐसे ही किसी बम का शिकार हो सकते हैं.
तो कीजिये इन्तजार अपने मरने का, अपने किसी सगे के मरने का ऐसे बम-ब्लास्ट में. अमेरिका को कोसने वाले देखें कि अमेरिका में ९/११ के बाद कितनी सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गयी और भारत में क्या किया गया. राजनीतिबाज तो कुर्सी के लिये हर चीज दांव पर लगाये बैठे हैं, उनके लिये कटघरे में तो हम ही खड़ा कर सकते हैं. बाहर से कोई नहीं आयेगा मदद के लिये. और अगर यूं ही सोये रहने का दिखावा करते रहे तो अपने मां-बाप, भाई-बहन, पुत्र-पुत्री के नाम की भी मोमबत्ती तैयार रखिये.

Monday, June 20, 2011

अल्पसंख्यकों को भेदभाव से मुक्ति मिलेगी ....

राजकेश्वर सिंह, नई दिल्ली अल्पसंख्यकों की ओर बड़ी हसरत से निहार रही सरकार उनके साथ होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने की जमीन तैयार कर रही है। कोशिशें मुकाम तक पहुंची तो कम से कम नौकरी, पढ़ाई और आवासीय योजनाओं के मामले में उनके साथ भेदभाव करने वाले को तीन माह की जेल तो होगी ही, पांच लाख रुपए का जुर्माना भी लगेगा। यदि सरकार ने अपनी योजना को अमली जामा पहनाया तो वैसा ही विवाद खड़ा हो सकता है, जैसा सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएससी) द्वारा सुझाए गए सांप्रदायिक हिंसा निषेध कानून के मसौदे के वक्त हुआ था। वैसे तो अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की योजना प्रस्तावित समान अवसर आयोग के जरिए यह सुविधा समाज के सभी वर्गो के वंचित समूहों को दिलाने की थी, लेकिन खुद सरकार के भीतर उभरे मतभेदों के चलते अब यह सिर्फ अल्पसंख्यकों तक ही सीमित रहेगी। सूत्रों के मुताबिक, प्रस्तावित आयोग के लिए तैयार मसौदे में नौकरी, शिक्षा और आवासीय योजनाओं में अल्पसंख्यकों संग भेदभाव रोकने का कड़ा प्रावधान किया गया है। इन मामलों के दोषियों को एक बार में तीन माह तक की सजा का प्रावधान है, जिसे बढ़ाया भी जा सकता है। पांच लाख तक का जुर्माना भी हो सकता है। उसके बाद भी भेदभाव का सिलसिला जारी रहने पर संबंधित विभाग, संस्था या दोषी व्यक्ति पर एक लाख रोजाना के हिसाब से अतिरिक्त जुर्माना किया जायेगा। सूत्र बताते हैं कि सभी वर्गों के वंचित समूहों के लिए प्रस्तावित इस आयोग के गठन पर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, मानव संसाधन, वाणिज्य, शहरी गरीबी उन्मूलन, जनजातीय कार्य, गृह, कानून व श्रम मंत्रालय के कड़े विरोध के बाद अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय अब सिर्फ अल्पसंख्यक वर्ग के वंचित समूहों के लिए इस आयोग के गठन की तैयारी में फिर से जुट गया है। उसका मसौदा तैयार है, दर्जन भर संबंधित मंत्रालयों से उनकी राय मांगी गयी है। उनकी टिप्पणी आने के बाद मसौदे को अंतिम रूप देकर कैबिनेट की मंजूरी के लिए भेजा जायेगा। यह आयोग व्यक्तिगत मामलों की सुनवाई करने के बजाय समूह की शिकायतों पर गौर करेगा। उसे सिविल कोर्ट के अधिकार होंगे। सच्चर कमेटी ने मुसलमानों की शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर अपनी रिपोर्ट में वंचित समूहों के लिए समान अवसर आयोग बनाने की सिफारिश की थी। गत लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में भी इसका वादा किया था। संप्रग की दोबारा सरकार बनने के बाद से ही यह उसके एजेंडे पर तो रहा, लेकिन सरकार के भीतर उभरे मतभेद उसकी राह में रोड़ा बने रहे। खुद प्रधानमंत्री को उसके लिए मंत्रियों का समूह गठन करना पड़ा। उसकी तीन बैठकें हुईं। उसमें भी मंत्रियों ने सभी वर्गों के साथ भेदभाव रोकने के लिए समान अवसर आयोग का विरोध किया। कुछ मंत्री तो अपने-अपने मंत्रालयों के अधीन आयोगों का कद कम होने के डर से इसे सिर्फ अल्पसंख्यकों तक ही सीमित रखना चाहते थे।
 

Sunday, June 12, 2011

एक प्राचीन कथा..

प्राचीन समय की बात है, एक बार विश्व के कई देशों के गृहरक्षकों के कौशल और चातुर्य की परीक्षा लेने के लिये एक प्रतियोगिता का आयोजन किया गया. इस प्रतियोगिता में एक परीक्षा आयोजित की गयी. इन देशों में युआश्व, आपान, स्क्वात और महार्य जैसे देश सम्मिलित थे.

परीक्षा हेतु युआश्व देश के गणाध्यक्ष श्रीमान दार्द जी की एक बकरी को घने जंगल में ले जाकर छोड़ दिया गया और चुनौती थी इस बकरी को कम से कम समय में खोज कर लाने की.
आपान देश के गृहरक्षकों ने जंगल की तरफ प्रस्थान किया और पन्द्रह घण्टे के परिश्रम के बाद बकरी बरामद की.
स्क्वात देश के गृहरक्षक इस कार्य को दस घण्टे में अंजाम दे सके.
युआश्व देश की तकनीकें बड़ी उम्दा थीं, वहां के गृहरक्षकों ने तकनीकी का प्रयोग किया और पांच घण्टे मे ही बकरी को खोज लिया.
अब बारी थी महान महार्य देश के गृहरक्षकों की. वे इधर गये और उधर से एक भालू जैसा जीव पकड़ लाये. महाराज दार्द जी उसे देखकर आश्चर्यचकित रह गये, उन्होंने कहा ये तो मेरी बकरी नहीं है. इस पर मगृसे के एक अधिकारी ने अपने नगरपाल को कुछ समझाया. नगरपाल उस जीव को लेकर कारागार के एक कमरे की तरफ ले गया और आधे घण्टे बाद लेकर आया.
अब वह जीव जोर-जोर से कह रहा था, मैं भालू नहीं बकरी हूं, महाराज दार्द की ही बकरी हूं, बकरी हूं.
बात यहीं पर खत्म नहीं हुई. 

इस घटना के बाद पशुप्रेमियों की संस्थाओं ने बड़ी आपत्ति की, कि इस प्रकार का रवैया तो पशुओं के अधिकारों का उल्लंघन है और एक नोटिस जारी कर दिया. .फिर इस प्रकरण पर जांच बैठी. इस जांच में मगृसे के एक वरिष्ठ अधिकारी को पूरा दायित्व सौंपा गया. उनके दल में मआसे के एक अधिकारी थे और स्थानीय प्रशासन के भी कुछ अधिकारी शामिल थे.
आठ साल अठारह महीने में अठहत्तर मीटिंगों में तकरीबन चार सौ बयालीस लोगों के बयान दर्ज किये गये. कुछ वृद्ध व्यक्ति थे जो जांच पूरी होते होते अगला जन्म लेने हेतु स्वर्ग सिधार गये. बच्चे भी थे जो युवा हो गये और जांच पूरी होते होते भूल गये कि उन्होंने क्या देखा था. जिन पर आक्षेप लगे थे वे सेवानिवृत्त हो गये. महार्य देश की मात्र दो सौ अठ्ठावन करोड़ मुद्रायें इस जांच में व्यय हुई. प्रतिपक्ष ने इस आयोग की जांच पर प्रश्न चिन्ह उठाये और विधान-पंच-समिति को नहीं चलने दिया.
इस पर महार्य देश के गणाध्यक्ष ने एक और समिति बना दी आयोग के निष्कर्षों की जांच के लिये, जिसमें चार उनके अपने दल के, दो अ०अ०ब०द० के, एक ज०ब०स०द० के, दो क०ख०ग०पा० के पंच-समिति सदस्य सम्मिलित किये गये. समिति ने कुछ संशोधन और कुछ सुझाव दिये.
जानवरों के हितों की रक्षा के लिये दिये गये सुझावों को मान लिया गया और मगृसे और मआसे के दर्जन भर अधिकारियों  को प्रति वर्ष ट्रेनिंग लेने और मानव तथा पशु संसाधनों के डवलपमेंट हेतु युआश्व जाने का प्रस्ताव रखा गया जिसे एक संशोधन के बाद सहर्ष स्वीकार कर लिया गया. इस संशोधन में यह किया गया कि विधान-पंच-समिति के भी आठ सदस्यों को प्रतिवर्ष प्रशिक्षण हेतु इसमें सम्मिलित कर लिया गया.यह सदस्य अकेले रहने के अभ्यस्त नहीं थे इसलिये उन्हें सपरिवार जाने की अनुमति दी गयी.
एक बार फिर वही प्रतियोगिता आयोजित हुई. यह प्रतियोगिता हर चार वर्ष में आयोजित की जाती थी. 
पुन: बकरी छोड़ी गयी.
आपान देश के गृहरक्षकों ने उसे आठ घण्टों में खोज लिया.
स्क्वात देश के गृहरक्षक पांच घण्टे में खोज लाये.
युआश्व देश के गृहरक्षकों को मात्र तीन घण्टे लगे महाराज की बकरी खोजने में.
अब मौका मिला महार्य देश के गृहरक्षकों को. वे घण्टे भर के अन्दर लौट आये. मगर यह क्या! पुन: भालू जैसा जीव. लोगों में खुसर-पुसर प्रारम्भ हो गयी. इन लोगों ने कुछ भी नहीं सीखा, लगता है फिर इस जीव को अन्दर ले जाया जायेगा.
मगृसे के अधिकारी ने गर्व से चारों तरफ देखा, उसकी समझ में आ चुका था कि लोग क्या कह रहे हैं. उसने एक संकेत दिया. नगरपाल आ गये. इस बार उन्होंने भालू की रस्सी को नहीं पकड़ा. मगृसे के अधिकारी माइक सम्भाल चुके थे. उन्होंने कहना प्रारम्भ कर दिया. "आप लोगों को लग रहा होगा कि हम लोग फिर जीवों के अधिकारों का उल्लंघन करेंगे, किन्तु ऐसा बिल्कुल भी नहीं है, हम युआश्व देश में ट्रेंड होकर लौटे हैं, कोई इस जीव को छुयेगा तक नहीं."
लोग आश्चर्यचकित थे. नगरपाल महाराज दार्द के पास पहुंचे और उन्हें अपने साथ ले गये. थोड़ी देर बाद महाराज दार्द वापस आ गये. अब महाराज कह रहे थे "यही तो मेरी बकरी है".

Saturday, June 11, 2011

एक इस्लामी मुल्क में एक नौजवान की सरेआम हत्या




क्या इन्हें मानव कहा जा सकता है? यह किस धर्म को मानते हैं, कौन सी शिक्षा ग्रहण कर आये हुये लोग हैं जो एक नौजवान को सरेआम गोली दाग कर मौत के घाट उतार देते है ? इतना निर्मम , क्रूर और जघन्य आचरण!

Thursday, June 9, 2011

बाबा रामदेव जी, आप क्यों सोने का दिखावा करने वालों को जगाना चाहते हैं...

किसके लिये आप कर रहे हैं ये सब. जिनके लिये कर रहे हैं उन्हें  कोई मतलब ही नहीं.
जनता के दिमाग में घुसा दिया गया है कि भ्रष्टाचार खत्म हो ही नहीं सकता.
बाबा की सम्पत्ति का ब्यौरा सब मांग रहे हैं, और उसमें भी छेद खोज रहे हैं लेकिन बाकी दागी-बागी किसी से आजतक पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाये कि भैया नेताजी, उद्योगपति जी और अफसर जी आपके पास कितना धन है, कहां कहां कितनी सम्पत्ति है.
बाबा ने ट्रस्टों के बारे में बता दिया वो तो चलो ठीक है लेकिन कम्पनियों के बारे में क्यों नहीं बताया.
किसी राजनीतिक दल का लेखा-जोखा लेने की हिम्मत आजतक नहीं हुई.
बाबा नींबू-पानी-शहद लेने पर तैयार हो गये हैं, इस पर बहुत बड़ी आपत्ति है. चैनल वाले कह रहे हैं कि ऐसा क्यों कर रहे हैं बाबा.
बाबा ने कानून तोड़ा, लेकिन सुनील कुमार की पिटाई करने वालों ने क्या कानून की प्रतिष्ठा में इजाफा किया.
जिस उम्र में युवा सुरा-सुन्दरी की कल्पना करने लगते हैं, उस उम्र में बाबा एक कपड़े को पहन योग सिखाना प्रारम्भ करते हैं. हमारे जैसे बड़बड़ाने वाले कितने लोगों में हिम्मत है ऐसा करने की.
बाबा ने पूरे देश में गांव गांव जाकर जागृति  फैलाने का कार्य किया, कितने लोगों ने ऐसा किया. कितने लोग घूमे हैं गांव-गांव.
बाबा ने क्यों पहन लिया महिलाओं का चोला. अपनी जान बिना मतलब में खतरे में डालना कोई बुद्धिमानी है. यदि पुलिस बाबा की सुरक्षा के लिये आई थी तो क्या सभी नेताओं की सुरक्षा इसी तरह से करती है पुलिस.
और फिर लाख कमियां हों बाबा के अन्दर, हो भी सकती हैं, आखिर रेमण्ड्स मैन होना तो लगभग नामुमकिन है, लेकिन उनके द्वारा उठाये जा रहे मुद्दे क्या कोई मायने नहीं रखते. अरे कानून बने तो सही, बाबा की भी जांच उसी स्कैनर से हो जाये.
हत्या-बलात्कार-डकैती-धोखाधड़ी के आरोपी संसद-विधानसभा में पहुंच कर माननीय हो जाते हैं और एक व्यक्ति जो व्यवस्था की कमी दिखा रहा है उस के लिये पहले ही अपराधी सिद्ध किया जा रहा है.
भ्रष्टाचार की लड़ाई आम आदमी को लड़ना चाहिये बाबा कौन होते हैं. फिर हमें नेताओं और कानूनों की भी जरूरत है क्या. सारी लड़ाई तो आम आदमी खुद ही लड़ सकता है और लड़ता चला भी आ रहा है और यह भी सम्भव है कि हजार-डेढ़ हजार साल में भारत के आम आदमी की यह सारी दिक्कतें दूर हो जायें.
बाबा को योग ही सिखाना चाहिये. वकील, डाक्टर, अध्यापक, व्यापारी फिर राजनीति में क्यों दाखिल हो जाते हैं उन्हें भी इस्तीफा देकर अपना धन्धा ही संभालना चाहिये.
बाबा ने लोगों से मांगकर धन कमाया उससे तमाम अन्य प्रोजेक्ट स्थापित किये, क्यों किये? उनका यह काम नहीं था, उनका काम था, उस धन से मठ बनाकर चुपचाप बैठ जाते और प्रवचन करते रहते. क्या फायदा सैकड़ों हजारों लोगों को रोजगार देने का, क्या लाभ तमाम गांवों में कार्य करने का.
योगी हैं फ्री में सिखायें, बहुत कमा चुके हैं. डाक्टर, अध्यापक, वकील, व्यापारी इन लोगों से भी अपील की जाये कि बहुत कमा लिया , फ्री में काम करें.

Sunday, June 5, 2011

सन्न और निशब्द

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Saturday, May 14, 2011

दोस्ती की कुछ् तो कीमत चुकानी ही पड़ेगी

अभी अभी खबरों में आ रहा है कि आर एस पुरा सेक्टर में पाकिस्तान की तरफ से भारी गोलाबारी हो रही है और बी एस एफ का एक जवान शहीद हो चुका है. उसकी शहादत को नमन और ऐसी शहादतों को कूड़ेदान में फेंकने वाले निकम्मे राजनीतिबाजों को धिक्कार. आखिर कब तक बिरयानी खिलाई जाती रहेगी पाकिस्तान और पाकिस्तान के समर्थक देश में रहने वाले नागरिकों को. कब तक अमन की आशा और क्रिकेट कूटनीति जैसे जुमले उछालकर भारत के आम नागरिकों को बेवकूफ बनाया जाता रहेगा. कब तक हमारे जवानों को शहीद करवाया जाता रहेगा, कभी संसद के हमलों में, कभी सीमाओं पर और कभी मुम्बई में. आखिर कब तक? अब अगर यह दोस्ती की कीमत है तो ऐसी दोस्ती से दुश्मनी बेहतर.

Thursday, May 5, 2011

वीभत्स और घृणित - मूक जानवरों के साथ ऐसा अत्याचार

कुछ कह नहीं सकता. शायद ही इससे अधिक बर्बर कृत्य कोई और हो. ये जानवर बोल नहीं सकते, लेकिन महसूस तो कर ही लेते हैं. कटने वाले किसी पशु-पक्षी को उस समय देखिये जब कसाई उसे अपने हाथ में पकड़ता है. हर समय, हर रोज, कभी स्वाद के लिये, कभी जरूरत के लिये और कभी त्योहारों और प्रथाओं के नाम यह व्यवहार! साइज इस लिये इतना छोटा कर दिया है कि इसे देखते ही विचलित कर देने वाला और अप्रिय अहसास हो सकता है...
यह रहा लिंक.
Embedded Video हटा दिया गया है, आपको ऊपर लिंक पर क्लिक कर देखना पड़ेगा.यदि कलेजा मजबूत हो तो ही  देखियेगा...

Monday, May 2, 2011

ओसामा मारा गया

अमेरिका ने अपने  और मानवता के दुश्मन ओसामा बिन लादेन को मार गिराया. भारत की राजनीति के व्यापारियों अब तो कुछ शर्म करो. पाकिस्तान को अब तो सहलाना बन्द करो. भारत की खुफिया एजेंसियों के प्रमुखों कुछ तो इससे सीखो.
अब तो अपने नागरिकों की जान की सुरक्षा करो और जिन्होंने हमारे बंधुओं की जान ली है, उनके लिये समुचित उत्तर दो.

पंकज मलिक साहब का गाया हुआ एक गीत...


"ये रातें, ये मौसम, ये हंसना-हंसाना", पंकज मलिक साहब का गाया हुआ एक गीत सुनें. इस गीत के शब्द मुझे बहुत अच्छे लगते हैं, बहुत कोमल शब्द रचना है. इन्हीं का गाया हुआ एक गीत है "हुआ आंख और दिल में झगड़ा". इस गीत का आर्केस्ट्राइजेशन कमाल का है, मुझे तो सम्मोहित सा कर लिया इस गीत ने. अगली दफा आपको सुनवाऊंगा.

Sunday, May 1, 2011

"मन्ना डे" साहब को जन्मदिन पर बधाई और शुभकामनायें..

आज मन्ना डे साहब का जन्म दिन है. बड़े महान गायक हैं मन्ना दा. एक बार पुन: उन्हें बधाई और सारे चाहने वालों को भी..

चलो न गोरी मचल मचल के

चलो न गोरी मचल मचल के अभी तो बालापन है. चांद सी सूरत प्रेम की मूरत पांवों में झांझन है. यह गीत गाया है सी०एच०आत्मा जी का. यूट्यूब पर खोजते हुये यह गीत मिल गया. कितने कोमल भाव हैं इस गीत में. कई वर्ष पहले चन्द्रू जी की आवाज के कुछ कैसेट खरीदे. कैसेट खरीदते समय यह भान नहीं था कि इसमें इतनी बढ़िया आवाज छुपी होगी, इतना खूबसूरत संगीत और उतने ही खूबसूरत बोल होंगे. कई फिल्मों में भी अभिनय किया है. और शायद कामचोर के एक गीत में एक दो पंक्तियां भी गाई थीं, "तुम से बढ़कर दुनिया में न देखा कोई और" में प्रारम्भिक पंक्तियां आत्मा साहब ने ही गाई थीं और उसके बाद किशोर कुमार ने यह गाना गाया था.  बहुत ही दमदार और मधुर आवाज है जनाब की. मुझे अधिक जानकारी नहीं, अगर आप देंगे तो अच्छा लगेगा. कभी कभी यह सोचकर खराब लगता है कि हम लोग अपने इस बेशकीमती खजाने की कद्र नहीं कर सके और यह सोचकर अच्छा भी लगता है कि हमारा देश तो वाकई हीरे उगलता है... लीजिये सुनिये..

Friday, April 29, 2011

क्षुब्ध हूं, पुलिस के इन कारनामों को देखकर...

लगभग हर रोज ही अखबारों में पुलिस वालों की ज्यादती के किस्से पढने को मिल जाते हैं. अपराधों की रिपोर्ट न लिखना तो रोजमर्रा की बात बन चुकी है. फर्जी एनकाउन्टरों के किस्से अखबारों में खूब मिलते हैं. एक बार तो एक "अपराधी" का लाइव एनकाउन्टर भी देखने में आया, जिसे पुलिस वाले दौड़ने को कहते हैं और पीछे से एके-४७ का बर्स्ट खोल देते हैं. जज की तरह काम करना प्रिय शगल बन चुका है पुलिस वालों का. कुछ दिनों पहले एक घटना का जिक्र अखबार में था कि बस लूट ली गई और जब रिपोर्ट दर्ज कराने ड्राइवर और कंडक्टर थाने गये तो थानेदार ने लूटी गयी रकम पूछी और जितनी रकम लुटी थी उतनी देकर विदा कर दिया. लखनऊ में एक रैली में एक डीआईजी साहब को एक व्यक्ति को जूतों से रौंदते हुये देखा जा चुका है. उसी पुलिस के एक सिपाही को मेरठ में किसी नेता ने जमकर पीटा और पुलिस की हिम्मत नहीं हुई अपने सिपाही को बचाने की. उसी पुलिस के वीर अफसर ने वीरता दिखाते हुये महाराष्ट्र के कोल्हापुर में ट्रेनी महिला सिपाहियों का यौन शोषण किया और उसके बाद एक लड़की की मेडिकल रिपोर्ट तक बदलवा दी, पहले की दो रिपोर्ट में वह लड़की गर्भवती थी और आखिरी रिपोर्ट में नहीं. मकान-दुकान पर कब्जा करने, खाली कराने, सट्टे में लिप्त होने जैसी मामूली बातें तो रोज ही शाया होती रहती हैं. यह वही पुलिस है जो क्राउन के प्रति समर्पित थी और यहां के लोगों पर अत्याचार करती थी, साथ में अपना घर भरती जाती थी. सन सैंतालीस के बाद फर्क अवश्य आया और वह यह कि अभी तक जो वफादारी क्राउन के प्रति थी, वह सत्तादेवी के प्रतिनिधियों की दिशा में मुड़ गयी. ये वही सिविल सर्वेन्ट हैं जिन्हें लौह ढ़ांचा माना गया था, और यह बात भी पूर्णतया सही है, ये लोहे के ही हैं, ठोस लोहे के. मानवीय अनुभूतियों और संवेदनाओं से परे. इन्होंने भी वही प्रक्रिया अपनाई जो पुलिस ने अच्छी समझी. जहां तक मुझे समझ आता है जस्टिस मुल्ला ने बड़ी तीखी टिप्पणी की थी, पुलिस पर और पुलिसिया मानसिकता पर. इसी पुलिस सेवा का एक अधिकारी फरार घोषित हो चुका है, जिसे आजतक पुलिस नहीं खोज पाई. डान की पार्टी में नृत्य करते हुये नजर आते हैं बड़े बड़े पुलिस वाले. एक अधिकारी अपना कमोड होमगार्डस से साफ कराता है. लगता है ये लोग पुलिस को Principal Organisation of Legislatively Incorporated Criminal Elements में बदल ही देंगे. भारत के लोगों की तकदीर में ऐसे ही छाले पड़े हुये हैं. 

Tuesday, April 26, 2011

श्री हरिगोविन्द विश्वकर्मा जी के द्वारा अनुवाद किया हुआ शाजिया नवाज का एक लेख

श्री हरिगोविन्द विश्वकर्मा जी के ब्लाग पर इस लेख को पढ़ें. यह शाजिया नवाज का लिखा हुआ है जिसे बहुत सुन्दरता से श्री हरिगोविन्द जी ने अनुवादित किया है. मुस्लिम स्त्रियों को बुर्का ओढ़ाने के बारे में है. हो सकता है कि आपमें से बहुत से लोगों ने पढ़ भी रखा हो, मुझे अच्छा लगा इसलिये शेयर करने का फैसला लिया.

Monday, April 25, 2011

कमी मेरे कम्प्यूटर में है या मेरी दीद में अथवा वेबसाइट की लापरवाही

अभी शीला जी को शाली, और सीओ की जगह डीएम लिखने का किस्सा तो दिखाया ही था, एक नमूना और देखिये, यह किस भाषा में लिखा हुआ है, जरा पढ़ने की कोशिश कीजिये. ब्राह्मी अथवा खरोष्ठी तो नहीं ही है. अब कौन सी लिपि है यह, विज्ञ जन ही बता पायेंगे. यह कमी मेरे कम्प्यूटर में है या मेरी दीद में या फिर वेबसाइट की लापरवाही, जरा बताइये तो सही.

Sunday, April 24, 2011

ये साइडलाइन पोस्टिंग क्या होती है.....

"श्री...... इतने साल से साइडलाइन पोस्टिंग भुगत रहे हैं". एक अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी के बारे में एक वेबसाइट पर यह पंक्तियां लिखी देखीं तो बड़ा आश्चर्य हुआ. आखिर यह साइडलाइन पोस्टिंग चीज क्या है और मेनस्ट्रीम पोस्टिंग क्या बला है. मुझे जहां तक जानकारी है कि किसी भी सेवा नियमावली में इस प्रकार की पोस्टिंग के बारे में कोई जानकारी दर्ज नहीं है. अब यह आफ द रिकार्ड चीज रही होगी तो इस पोस्टिंग से जुड़ी चीजें भी आफ द रिकार्ड ही होती होंगी. किसी भी सेवा में कोई पद जब महत्व का नहीं रहता तो खत्म कर दिया जाता है, इसलिये साइडलाइन पोस्टिंग जैसी चीज कम से कम मेरे गले नहीं उतरती. हर व्यक्ति का, हर पद का अपना महत्व है. सेना के ट्रक-ड्राइवर का भी उतना ही महत्व है जितना कि लड़ाकू विमान उड़ाने वाले पायलट का, बस अंतर समय और प्राथमिकता का है. अब यदि कोई यह शिकायत करे कि किसी व्यक्ति को साइडलाइन पोस्टिंग दी गयी है तो उसे पहले-पहल  दोनों पोस्टिंग में अन्तर बताना चाहिये कि क्या साइडलाइन पोस्टिंग में, मेनस्ट्रीम पोस्टिंग से एक-दो इन्क्रीमेंट तो कम नहीं कर दिये जाते या फिर कोई अन्य आर्थिक दण्ड तो नहीं लगा दिया जाता, यदि ऐसा नहीं है तो फिर मेनस्ट्रीम पोस्टिंग में फिर अवश्य ही कोई ऐसी चीज छुपी रहती है जो वैधानिक रूप से ठीक नहीं है, ऐसे द्रव्यों की प्राप्ति समाहित है, जो साइडलाइन पोस्टिंग में उस पद पर नहीं हो सकती होगी, अन्यथा फिर दोनों में क्या अन्तर रह जाता है. या फिर मेनस्ट्रीम पोस्टिंग में अपना रुतबा दिखाने का स्कोप रहता होगा जो कि साइडलाइन पोस्टिंग में नहीं रह जाता.
मेरा प्रश्न अपनी जगह अभी भी वैसे ही सर उठाये खड़ा है, कोई उत्तर मिलेगा क्या?

Saturday, April 23, 2011

खबर क्या है और शीर्षक क्या है.....

१-इस फोटो को देखिये और तथ्यों को पढ़िये. हिन्दी खबरों के प्रकाशन के जिम्मेदार व्यक्ति यह भी देखना पसन्द नहीं करते कि शीर्षक क्या कह रहा है और अन्दर तथ्य क्या लिखे हुये हैं. या फिर वे इतने अधिक व्यस्त हैं कि हिन्दी खबरों पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझते.





 २-अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के पक्षधर कौन होंगे हमारे देश में, जाहिर है कि अखबार और खबरिया चैनल तथा वेबसाइट्स. लेकिन अब इस को क्या कहेंगे जब वे अपने विरोध में आये हुये कमेन्ट को छापने से ही गुरेज करें. आखिर यह कैसी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता कि आप जो भी लिख दो, वह ठीक, आपकी हां में हां मिलाने वाला ठीक और जो आपकी खबर के विरोध में कोई चार लाइनें लिख दे तो उसे छापने से गुरेज.
कई चैनलों पर संजीव भट्ट जी का बयान तो आ रहा है, प्रिन्ट मीडिया में भी इसकी खूब खबर है, लेकिन यास्मीन ने जो गम्भीर आरोप तीस्ता सीतलवाड़ पर लगाये हैं, उनके बारे में एक-दो जगह छोड़कर कहीं कोई सुध नहीं. आखिर यह किस प्रकार की पत्रकारिता है जो पहले से ही तय कर लेती है कि क्या छापना है और क्या नहीं.

Sunday, April 17, 2011

वीडियोग्राफी क्यों नहीं हो सकती...

पंसारी तक की दुकान में छोटे-छोटे, कांच के चमकते हुये गोले लटके दिखाई देते हैं, यानी सीसीटीवी के कैमरे. जिनके माध्यम से लाला अपने कर्मियों पर निगाह रखता है कि कौन काम कर रहा है, कौन नहीं. कोई उसका माल तो दांये-बांये नहीं कर रहा. होटल-रेस्टोरेन्ट से लेकर कार्यालयों और बैंकों में यह युक्ति अपना कार्य कर रही है. सार्वजनिक स्थलों और संवेदनशील जगहों पर भी क्लोज सर्किट टेलीविजन के कैमरे देखे जा सकते हैं.
प्रस्तावित लोकपाल बिल के सम्बन्ध में ड्राफ्टिंग कमेटी की पहली बैठक हो चुकी है, जिसके बाद कपिल सिब्बल साहब यह कहते हुये सुने गये कि कमेटी के सदस्य काफी "समझदारी" दिखा रहे हैं. यद्यपि इसके बाद अरविन्द केजरीवाल जी ने काफी कुछ नसीहत भी सिब्बल जी को दे डाली. जैसा कि सुना है कि ड्राफ्टिंग कमेटी के गैर -सरकारी  सदस्य इन मीटिंगों की वीडियोग्राफी कराने के पक्ष में हैं किन्तु सरकारी पक्ष के सदस्य नहीं.
मेरी समझ में नहीं आता कि वीडियोग्राफी कराने में हर्ज क्या है. मुझे यह भी समझ में नहीं आता कि वीडियोग्राफी से किस प्रकार का खतरा हो सकता है या क्या कानूनी दिक्कतें हो सकती हैं. बल्कि मैं तो और एक कदम आगे जाकर कहूंगा कि इन मीटिंगों का "लाइव" प्रसारण होना चाहिये जिससे कि पूरे देश को यह पता तो चले कि उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों का और गैर-सरकारी सदस्यों का रुख मीटिंगों में कैसा रहता है, उनके विचार क्या होते हैं. किस प्रकार के सवाल-जवाब होते हैं, कैसे कैसे तर्क-वितर्क-कुतर्क सामने रखे जाते हैं, इन सभी सदस्यों की भाव- भंगिमायें कैसी रहती हैं. कौन क्या चाहता है, किसका व्यवहार कैसा रहता है. कम से कम असली सूरत तो दिखाई देना चाहिये हम लोगों को.

Thursday, April 14, 2011

अन्ना हजारे के अनशन के तारतम्य में.

अन्ना हजारे के अनशन के बाद बहुत सारी क्रियायें, प्रतिक्रियायें, तर्क, वितर्क और कुतर्क सामने आये. बहुत से लोगों ने कई शंकायें और आशंकाये भी जताईं. विशेषत: राजनीतिबाज, जिन्हें इस अनशन के दौरान रोष का सामना करना पड़ा, वे  कहीं सामने से तो  कहीं पीछे से वार करते रहे.  कुछ  स्वयंभू पत्रकारों ने भी अन्ना हजारे

Wednesday, April 13, 2011

हिन्दी है न, इसलिये.....


अब यह भाग्यशाली "शाली" कौन हैं, पता नहीं, लेकिन लगता है "शीला" को ही "शाली" लिख दिया  और  "सुपर" को "सपर" लिख दिया गया है. खबर का शीर्षक देखिये.  ऐसी छोटी-मोटी गलतियां तो हिन्दी में, हिन्दी के साथ, हिन्दी वालों के साथ हो ही जाती हैं.

Tuesday, April 12, 2011

क्या देश में एक प्रापर्टी डाटा बैंक नहीं होना चाहिये...

कालेधन को अधिकतर खपाया जाता है, जमीन-मकान-सोने की खरीद में और या फिर शेयर मार्केट में धन लगाकर. हमारे देश में जमीन-जायदाद खरीदना और गहने खरीदना बहुत प्रिय शगल है लोगों का. और कालेधन को लगाने का इससे मुफीद तरीका कोई नहीं. क्या देश के अन्दर कोई आनलाइन प्रापर्टी डाटा बैंक नहीं होना चाहिये जिस पर प्रापर्टी का पूरा ब्यौरा दर्ज हो, मसलन किसने उसे बेचा, खरीदा किसने, कीमत क्या थी और जिसने खरीदा उसके पास आय का स्रोत क्या है. आजकल लोग प्रापर्टी खरीदते भले काली कमाई से हों लेकिन उसे सफेद बनाने के लिये तमाम तरीके अपनाते हैं. ऐसे में प्रापर्टी लोन पर खरीदना एक अच्छा विकल्प होता है. इस डाटा बैंक में यह भी हो कि यदि लोन लिया है तो कितना, कितने साल का और लोन का भुगतान करने वाले के पास आय के क्या स्रोत हैं. यही बात निजी मेडिकल और इन्जीनियरिंग कालेज में अपने बच्चों को पढ़ाने वाले व्यक्तियों का है. निजी मेडिकल कालेज में एक विद्यार्थी पर पच्चीस लाख रुपये खर्च होना मामूली बात है. जो लोग इतनी अधिक फीस देते हैं, उनके आय स्रोत क्या हैं? क्या हम सब, जो अपनी गाढ़ी कमाई का एक हिस्सा देश के नेताओं-कर्मचारियों के वेतन-भत्तों के लिये देते हैं,  को इतना जानने का भी अधिकार नहीं, कि वे व्यक्ति कौन हैं जो हमारी गाढ़ी कमाई पर मौज कर रहे हैं.


Wednesday, April 6, 2011

अन्ना हजारे को अक्ल सिखाते हमारे बुद्धिजीवी

अन्ना हजारे जन-लोकपाल  को लेकर अनशन पर बैठ चुके हैं. अब हमारे यहां के बुद्धिजीवी उन्हें अकल सिखा रहे हैं. एक प्रवक्ता कह रहे हैं कि अन्ना को यह नहीं करना चाहिये, लोकतन्त्र के अन्दर ऐसी जिद ठीक नहीं. अन्ना को बताना चाहिये वे क्या चाहते हैं, बात करना चाहिये. एक अखबार वाले कह रहे हैं कि लोकतन्त्र है, ठीक है, लेकिन अन्ना को ऐसा नहीं करना चाहिये. ठीक है आप सबकी राय मान ली जायेगी, आप लोग खुद ही बताओ कि आप की पार्टी और आप के अखबार ने क्या किया है भ्रष्टाचार के विरुद्ध. कौन सा ठोस कदम इतने सालों में उठाया है भ्रष्टाचार से लड़ने के लिये. क्या प्रिवेंशन आफ करप्शन एक्ट काफी है. इस भ्रष्टाचार के विरुद्ध क्या किया जिसमें चालीस रुपये की दाल सौ रुपये में बिकवा दी, पच्चीस रुपये की चीनी सत्तर रुपये में बिकवा दी. निजी स्कूल, निजी अस्पताल अपनी मनमर्जी से फीस में दो सौ प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी कर देते हैं. विशेष स्कूल की विशेष किताबें विशेष दुकान पर विशेष मूल्य में. विशेष चिकित्सक की लिखी विशेष दवाई विशेष दुकान पर विशेष मूल्य में. एक सड़क जो बनना चाहिये थी, नहीं बनी. जो सात साल चलना चाहिये थी, सात महीने में उखड़ गयी. प्रधान जी-विधायक जी-सांसद जी जो कभी साइकिल पर चलते थे, पद पाते ही स्कूलों-कालेजों के संचालक बन गये और करोड़ों में खेलने लगे. हर चौराहे पर मची लूट किसी को नहीं दिखाई देती. प्रवक्ता जी और सम्पादक जी आपने इस सबके विरुद्ध क्या किया है, जरा हिसाब दें...

Friday, April 1, 2011

पोस्टमार्टम रिपोर्ट देने के भी तीन सौ रुपये.....

चौकी से पोस्टमार्टम रिपोर्ट की प्रतिलिपि लेने के लिये पांच चक्कर और तीन सौ रुपये. देश में किसी सुधार, किसी बदलाव, किसी क्रान्ति की गुंजाइश है ?

Monday, March 28, 2011

पायलटों के फर्जी लाइसेंस पर इतना हो-हल्ला क्यों ?

पूरे देश में बड़ी हाय-तौबा मची हुई है कि पायलटों के लाइसेंस में गड़बड़ियां हुई हैं. उनके उड़ान के घण्टे बढ़ा दिये गये हैं, थ्रोटल के पीछे बिना पर्याप्त समय बिताये ही. बिना जहाज उड़ाये ही उनके लाइसेंस जारी कर दिये गये हैं. एक असिस्टेन्ट डाइरेक्टर की गिरफ्तारी भी हुई है. इतना हंगामा बरपा दिया है, पूछो मत. आखिर इतना हो-हल्ला क्यों मचा रखा है एक छोटे से घोटाले को लेकर. क्या सिर्फ इसलिये कि हवाई-जहाज में यात्रा करने वाले बड़े लोग होते हैं. अमूमन बड़े लोग ही हवाई-जहाजों से यात्रा करते हैं और यदि कोई दुर्घटना होती है तो बड़े घरों के चश्म-ओ-चिराग, बड़े व्यापारी, नेता, पत्रकार इसके शिकार होते हैं. बिल्कुल यही बात है, अगर यह बात न होती तो इन बड़े लोगों की आंखों पर कौन सी पट्टी बंधी हुई है जिन्हें पायलटों का फर्जीवाड़ा तो दिखाई देता है, लेकिन वह फर्जीवाड़ा नहीं दिखाई देता जो हर जिले में रोज होता है. अगर अभी भी नहीं समझे तो जान जाइये - सड़क पर गाड़ी चलाने के लिये आवश्यक परमिट अर्थात ड्राइविंग लाइसेंस. किसी भी एक कारण से मरने वाले लोगों की संख्या से कई गुना अधिक लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं. इन दुर्घटनाओं के तीन ही मुख्य कारण होते हैं. पहला अपात्रों को ड्राइविंग लाइसेंस जारी करना और दूसरा गाड़ियों की फिटनेस, इसके अतिरिक्त तीसरा कारण खराब सड़कें और यातायात के नियमों का पालन न करना है. 
किसी भी जिले के परिवहन विभाग के दफ्तर को देख आइये. आप बिना आक्सीजन के एवरेस्ट शिखर पर तो चढ़ सकते हैं, लेकिन इनके दफ्तर के बाहर बैठे हुये दलालों की मदद के बिना आप न तो ड्राइविंग लाइसेंस बनवा सकते हैं और न ही अपनी गाड़ी से सम्बन्धित अन्य कार्य. हां, यदि आप रसूखदार व्यक्ति हैं तो आप के लिये कुछ भी असम्भव नहीं है. अव्वल तो आपको अपने कार्य से सम्बन्धित प्रपत्र मिलेंगे ही नहीं और अगर मिल भी जायेंगे तो आप फीस जमा नहीं कर पायेंगे. फीस जमा करने से लेकर लर्निंग/परमानेन्ट ड्राइविंग लाइसेन्स बनवाने के लिये इतने झंझट उठाने पड़ेंगे कि आप अपना सिर ठोक लेंगे कि पहले ही दलाल से क्यों न मिल लिये. सारी चीजें प्रशासन की जानकारी में होती हैं, नेता सब जानते हैं, अफसरों को सब पता होता है कि दफ्तर के बाहर बैठे यह दलाल जो बीमा-मित्र का बोर्ड लगाये रहते हैं, असल में दलाली का काम करते हैं. आप के पास कोई प्रमाणपत्र हो या न हो, इनके पास हर मर्ज का इलाज है. किसी भी व्यक्ति की उम्र, पते के सत्यापन के लिये इनके पास पहले से ही मौजूद कुछ फोटोकापियां होती हैं, जिन पर व्यक्ति का नाम पता कागज चिपकाकर लिख दिया जाता है और फिर उसकी फोटोकापी प्रपत्र के साथ संलग्न कर दी जाती है.
बस एक बार व्यक्ति को जरूर सक्षम प्राधिकारी के आगे प्रस्तुत होना पड़ता है, ऐसी मजबूरी इसलिये है क्योंकि कई दफा कुछ बदमाश व्यक्तियों ने कुछ प्रसिद्ध लोगों के नाम से ड्राइविंग लाइसेंस बनवा लिये या फिर अन्धे, लूले-लंगड़े लोगों के, जो गाड़ी चलाने के लिये किसी कीमत पर पात्र नहीं थे. 
ड्राइविंग लाइसेन्स बनवाने के लिये तमाम औपचारिकतायें होती हैं, एक टेस्ट भी होता है, जिसमें गाड़ी भी चलवाकर देखी जा सकती है और यातायात के नियमों की जानकारी की थाह लेना भी शामिल होता है, तथा लाइसेन्सार्थी की शारीरिक उपयुक्तता भी सम्मिलित है, किन्तु जब आर-बी-आई के गवर्नर द्वारा हस्ताक्षरित वचनपत्र सामने आ जाते हैं तो अन्य किसी भी चीज की वांछनीयता खत्म हो जाती है. न जाने कितने ऐसे लोगों के ड्राइविंग लाइसेन्स जारी कर दिये जाते हैं जो पूरी तरह से अपात्र होते हैं और नतीजा सामने आता है सड़क दुर्घटनाओं के रूप में. घर से निकलते वक्त किसी को भी यह आश्वासन नहीं होता कि वह शाम तक किसी सड़क दुर्घटना का शिकार नहीं होगा. जब आधे-अधूरे-बिना किसी ज्ञान के साथ  अपात्र ड्राइवर सड़क पर वाहन लेकर निकलेगा तो उससे क्या उम्मीद की जा सकती है. हजारों की संख्या में होने वाली सड़क दुर्घटनायें अपने आप में कहानी बयान करती हैं.
उम्मीद किससे? किसी से नहीं. क्यों? शिकायत किससे करेंगे. इन जगहों से रोज नेताओं-अफसरों का सामना होता है. लेकिन किसी को यह दिखाई नहीं देता, जिसे यह दिखाई ही नहीं देगा, उसे एक कागज पर लिखे हर्फ क्या दिखाई देंगे. शिकायत का नतीजा यहां होता क्या है, सब जानते हैं, पहले आप अपनी शिकायत करने के लिये पच्चीस-पचास रुपये लगायें, फिर उसका नतीजा (जो कभी नहीं आता या आता है तो शिकायत आधारहीन पाई जाती है या फिर शिकायत करने वाले को आदतन शिकायतकर्ता बता दिया जाता है) जानने के लिये फिर तीन-चार महीने और डेढ़-दो सौ रुपये खर्च करें. और हां, काम तो होगा नहीं, क्योंकि शिकायत हो गयी है. कोई अधिक तगड़ा फंस गया तो शिकायतकर्ता का हाल इन्जीनियर सत्येन्द्र की तरह भी हो सकता है. इसलिये नतीजा सिफर. शून्य की खोज का श्रेय भी तो भारत के लिये ही जाता है. क्या इस सबसे यह सिद्ध नहीं होता कि सड़क पर चलने वाले की जान की कीमत, हवाई जहाज में चलने वाले की जान की अपेक्षा नगण्य है, इसीलिये पायलटों के फर्जीवाड़े पर इतना शोर और ड्राइवरों के लाइसेंस जारी करने में धांधली के खिलाफ एक शब्द तक नहीं, कार्रवाई तो बहुत दूर की बात है.

Friday, March 18, 2011

हमें शर्म कब आयेगी...

पहले अमेरिकी दबाव में मन्त्री बदले जाते हैं, फिर न्यूक्लियर डील के चलते सरकार बचाने के लिये चालीस करोड़ की रकम दी जाती है सांसदों को मैनेज करने के लिये. विकीलीक्स के खुलासे के बाद अब Lame Excuses ही शेष बचते हैं. अब कुछ भी कहने को शेष नहीं. लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि जिन्हें इस सब का पता है और जो इन बातों पर मगजमारी करते हैं, उनमें से अधिकतर न तो वोट देते हैं और न ही उनके वोटों में इस सब को बदलने की ताकत होती है; और जो वोट देते हैं उन्हें न तो इस सब का पता होता और न ही इस सब से कुछ लेना-देना.

गिद्ध तो देखे ही होंगे. प्रकृति के स्वच्छकार. मृत जानवरों को खाकर अपना पेट पाल लेते हैं और सफाई भी कर  देते हैं. लेकिन उन्हें क्या कहेंगे जो कफनखसोट हैं. जीवित के साथ मुर्दे को भी नहीं बख्शते. अगर मानवीय गिद्ध न देखे हों तो पोस्ट-मार्टम हाउस पर देख लीजिये. पहले आठ सौ से हजार रुपये पोस्ट-मार्टम के लिये, फिर सिपाही जी की सेवा. मृत शरीर के लिये स्ट्रेचर भी नसीब नहीं होता. उल्टे-सीधे ढ़ंग से सिला हुआ शरीर,  रखने की जगह न तो पोस्ट-मार्टम से पहले नसीब होती है और न ही बाद में. दो लोग एक डण्डा नीचे से लगाकर पटक देते हैं.  स्वच्छकार और सिलाई करने वाले को पैसे देना तो इसलिये समझ में आ सकता है क्योंकि यह बाहर से लाये गये लोग होते हैं, जिनके लिये नगण्य वेतन दिया जाता है. लेकिन बाकी लोग?  वो वर्दीधारी जो शव को ले जाने के लिये सौ रुपये लेता है. वो व्यक्ति जो पोस्टमार्टम कराने के लिये आठ सौ-हजार रुपये ले जाता है. शायद गिद्ध भी इनसे लाख गुना अच्छे होते हैं..


Wednesday, March 16, 2011

ए०राजा के सहयोगी बाचा की मौत, और हमारे नेता चाहते हैं लोकायुक्त के अधिकारों की समीक्षा

टेलीकाम घोटाले के आरोपी ए०राजा के निकट रहे सादिक बाचा ने आत्महत्या कर ली. सादिक की कम्पनियों में टेलीकाम घोटाले की धनराशि लगाने का संदेह था. सादिक बाचा से कई दौर की पूछताछ की जा चुकी थी और अब जब सादिक बाचा ही नहीं रहा तो एक अहम गवाह की गवाही सिरे से गयी. लिहाजा टेलीकाम घोटाले की भी धीरे-धीरे शान्ति से ठण्डे पड़ने की पूरी सम्भावना है.

शीला दीक्षित जी कह रही हैं कि लोकायुक्त के अधिकारों की समीक्षा होना चाहिये. बसपा के एक विधायक भी कहते हुये दिखाई दिये कि राजनीति में तो झूठी शिकायतें भी बहुत होती हैं और हर शिकायत पर नोटिस, ये-वो होने लगा तो बहुत दिक्कत हो जायेगी. मजे की बात यह है कि यह तय कौन करेगा कि शिकायत सच्ची है या झूठी, इसी के लिये तो लोकायुक्त बनाया गया है. लोकायुक्त जिस मन्त्री को हटाने की सिफारिश करते हैं, उस मन्त्री को अभी तक पद पर रखा गया है. शायद यही तरीका है भ्रष्टाचार से लड़ने का.

आरक्षण, समर्थन और विरोध

पहले एक बिरादरी आरक्षण की मांग को लेकर राजस्थान में सामने आई थी और अब उत्तर प्रदेश में एक और बिरादरी. दलित मुस्लिम और ईसाई नाम की एक नई बिरादरी भी सामने आ रही है, इन्हें भी आरक्षण देने की मांग उठ रही है. यद्यपि इस बिरादरी की मांगों का विरोध भी होना प्रारम्भ हो गया है. विरोध वे कर रहे हैं, जिन्हें लगता है कि यदि इस बिरादरी को आरक्षण दे दिया गया तो उनकी प्रतिशतता कम हो जायेगी. आरक्षण अब नौकरी तक सीमित नहीं रह गया, इसका व्यापक प्रभाव हर क्षेत्र में है, शिक्षा, नौकरी, पदोन्नति, राजनीति, ठेके वगैरह. हर वह बिरादरी जो वोट बैंक बन सकती है या बन जाती है, आरक्षण की मांग कर रही है. आज एक जाति है तो कल दूसरी खड़ी होगी. यह एक अच्छा तरीका हो सकता है यदि जातियों के अनुपात में सभी के लिये आरक्षण दे दिया जाये. इसमें किसी बिरादरी के नाराज होने की भी सम्भावना नहीं. जिस की जितनी जनसंख्या, उसी अनुपात में आरक्षण. इसमें अधिक कठिनाई भी नहीं होना चाहिये क्योंकि जनगणना के बाद सारे आंकड़े उपलब्ध हो जायेंगे. लेकिन फिर वही दिक्कत रहेगी कि यदि इसे लागू कर दिया गया तो फिर यह मुद्दा शायद राजनीति के लिये कारगर नहीं रह जायेगा.

Tuesday, March 15, 2011

सत्यार्थ प्रकाश के बारे में एक छोटा सा सवाल

"सत्यार्थ प्रकाश"  एक बहुत अच्छा ग्रन्थ है. मैंने पूरा तो नहीं पढ़ा लेकिन इसके कुछ पृष्ठ पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.  स्वामी दयानन्द द्वारा लिखित यह ग्रन्थ मन को झकझोरने वाला है. इसे प्रकाशित हुये लगभग सौ वर्ष से ऊपर हो गये हैं. अभी आई०टी०एक्ट में सम्भावित संशोधन के बारे में काफी चर्चा है. आई०टी० एक्ट में प्रस्तावित संशोधनों के ऊपर चर्चाओं को पढ़ने के बाद मेरे मन में यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि स्वामी दयानन्द क्या आज की तारीख में सत्यार्थ प्रकाश प्रकाशित कराने में कामयाब हो सकते? और यदि येन-केन-प्रकरेण प्रकाशित हो भी जाता तो क्या होता ???   

Friday, March 11, 2011

कई दर्जन ब्लागरों को पुरस्कार दिए जाने का ऐलान

रविन्द्र प्रभात जी के ब्लाग पर खबर है कि :-

प्रकाशन संस्‍थान हिंदी साहित्‍य निकेतन 50 वर्षों की अपनी विकास-यात्रा और गतिविधियों को प्रस्‍तुत करने के लिए एक भव्‍य आयोजन कर रहा है. यह कार्यक्रम आगामी 30 अप्रैल को हिंदी भवन में दोपहर तीन बजे से आयोजित किया जाएगा. इस मौके पर देश विदेश में रहने वाले लगभग 400 ब्‍लॉगरों का सम्‍मेलन भी आयोजित किया जा रहा है. परिकल्‍पना समूह के तत्‍वावधान में आयोजित ब्‍लॉगोत्‍सव 2010 के अंतर्गत चयनित 51 ब्‍लॉगरों को 'सारस्‍वत सम्‍मान' से नवाजा जाएगा.
इस मौके पर लगभग 400 पृष्‍ठों की पुस्‍तक 'हिंदी ब्‍लॉगिंग : अभिव्‍यक्ति की नई क्रांति', हिंदी साहित्‍य निकेतन की द्विमासिक पत्रिका 'शोध दिशा' के विशेष अंक (इसमें ब्‍लॉगोत्‍सव 2010 में प्रकाशित सभी प्रमुख रचनाओं को शामिल किया गया है), हिंदी उपन्‍यास 'ताकि बचा रहे गणतंत्र', रश्मि प्रभा के संपादन में प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका 'वटवृक्ष' के प्रवेशांक के साथ कई अन्‍य किताबों का भी लोकार्पण होगा. इस कार्यक्रम में विमर्श, परिचर्चाएं एवं सांस्‍कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किया जाएगा. पूरे कार्यक्रम का जीवंत प्रसारण इंटरनेट के माध्‍यम से पूरे विश्‍व में किया जाएगा.
हिंदी ब्‍लॉगिंग में अविस्‍मरणीय योगदान देने वाले 51 ब्‍लॉगरों को मोमेंटो, सम्‍मान पत्र, पुस्‍तकें, शाल एवं एक निश्चित धनराशि प्रदान कर सम्‍मानित किया जाएगा. सम्‍मानित किए जाने वाले ब्‍लॉगरों का विवरण
1.         वर्ष का श्रेष्ठ नन्हा ब्लॉगर - अक्षिता पाखी, पोर्टब्लेयर
2.         वर्ष के श्रेष्ठ कार्टूनिस्ट - श्री काजल कुमार, दिल्ली
3.         वर्ष की श्रेष्ठ कथा लेखिका - श्रीमती निर्मला कपिला, नांगल (पंजाब)
4.         वर्ष के श्रेष्ठ विज्ञान कथा लेखक - डॉ. अरविन्द मिश्र, वाराणसी
5.         वर्ष की श्रेष्ठ संस्मरण लेखिका - श्रीमती सरस्वती प्रसाद, पुणे
6.         वर्ष के श्रेष्ठ लेखक - श्री रवि रतलामी, भोपाल
7.         वर्ष की श्रेष्ठ लेखिका (यात्रा वृतान्त) - श्रीमती शिखा वार्ष्णेय, लंदन
8.         वर्ष के श्रेष्ठ लेखक (यात्रा वृतान्त) - श्री मनोज कुमार, कोलकाता
9.         वर्ष के श्रेष्ठ चित्रकार - श्रीमती अल्पना देशपांडे, रायपुर
10.       वर्ष के श्रेष्ठ हिन्दी प्रचारक - श्री शास्त्री जे.सी. फिलिप, त्रिवेन्‍द्रम
11.       वर्ष की श्रेष्ठ कवयित्री - श्रीमती रश्मि प्रभा, पुणे
12.       वर्ष के श्रेष्ठ कवि - श्री दिवि‍क रमेश, दिल्ली
13.       वर्ष की श्रेष्ठ सह लेखिका - सुश्री शमा कश्यप, पुणे
14.       वर्ष के श्रेष्ठ व्यंग्यकार - श्री अविनाश वाचस्पति, दिल्ली
15.       वर्ष की श्रेष्ठ युवा गायिका - सुश्री मालविका, बैंगलोर
16.       वर्ष के श्रेष्ठ क्षेत्रीय लेखक - श्री संजीव तिवारी, रायपुर
17.       वर्ष के श्रेष्ठ क्षेत्रीय कवि - श्री एम. वर्मा, वाराणसी
18.       वर्ष के श्रेष्ठ गजलकार - श्री दिगम्बर नासवा, दुबई
19.       वर्ष के श्रेष्ठ कवि (वाचन) - श्री अनुराग शर्मा, पिट्सबर्ग अमेरिका
20.       वर्ष की श्रेष्ठ परिचर्चा लेखिका - श्रीमती प्रीति मेहता, सूरत
21.       वर्ष के श्रेष्ठ परिचर्चा लेखक - श्री दीपक मशाल, लंदन
22.       वर्ष की श्रेष्ठ महिला टिप्पणीकार - श्रीमती संगीता स्वरूप, दिल्ली
23.       वर्ष के श्रेष्ठ टिप्पणीकार - श्री हिमांशु पाण्डेय, सकलडीहा (यू.पी.)
24-25-26.  वर्ष की श्रेष्ठ उदीयमान गायिका – खुशबू/अपराजिता/इशिता, पटना (संयुक्त रूप से)
27.       वर्ष के श्रेष्ठ बाल साहित्यकार - श्री जाकिर अली 'रजनीश', लखनऊ
28.       वर्ष के श्रेष्ठ गीतकार  (आंचलिक) - श्री ललित शर्मा, रायपुर
29.       वर्ष के श्रेष्ठ गीतकार (गायन) - श्री राजेन्द्र स्वर्णकार, जयपुर
30-31.  वर्ष के श्रेष्ठ उत्सवी गीतकार - डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक', खटीमा एवं आचार्य संजीव वर्मा सलिल, भोपाल (संयुक्त रूप से)
32.       वर्ष की श्रेष्ठ देशभक्ति पोस्ट - कारगिल के शहीदों के प्रति ( श्री पवन चंदन)
33.       वर्ष की श्रेष्ठ व्यंग्य पोस्ट - झोलाछाप डॉक्टर (श्री राजीव तनेजा)
34.       वर्ष के श्रेष्ठ युवा कवि - श्री ओम आर्य, सीतामढ़ी बिहार
35.       वर्ष के श्रेष्ठ विचारक - श्री जी.के. अवधिया, रायपुर
36.       वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग विचारक - श्री गिरीश पंकज, रायपुर
37.       वर्ष की श्रेष्ठ महिला चिन्तक - श्रीमती नीलम प्रभा, पटना
38.       वर्ष के श्रेष्ठ सहयोगी - श्री रणधीर सिंह सुमन, बाराबंकी
39.       वर्ष के श्रेष्ठ सकारात्मक ब्लॉगर (पुरूष) – डॉ. सुभाष राय, लखनऊ  (उ0प्र0)
40.       वर्ष की श्रेष्ठ सकारात्मक ब्लॉगर (महिला) - श्रीमती संगीता पुरी, धनबाद
41.       वर्ष के श्रेष्ठ तकनीकी ब्लॉगर - श्री विनय प्रजापति, अहमदाबाद
42.       वर्ष के चर्चित उदीयमान ब्लॉगर - श्री खुशदीप सहगल, दिल्ली
43.       वर्ष के श्रेष्ठ नवोदित ब्लॉगर - श्री राम त्यागी, शिकागो अमेरिका
44.       वर्ष के श्रेष्ठ युवा पत्रकार - श्री मुकेश चन्द्र, दिल्ली
45.       वर्ष के श्रेष्ठ आदर्श ब्लॉगर - श्री ज्ञानदत्त पांडेय, इलाहाबाद
46.       वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग शुभचिंतक - श्री सुमन सिन्हा, पटना
47.       वर्ष की श्रेष्ठ महिला ब्लॉगर - श्रीमती स्वप्न मंजूषा 'अदा', अटोरियो कनाडा
48.       वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉगर - श्री समीर लाल 'समीर', टोरंटो कनाडा
49.       वर्ष की श्रेष्ठ विज्ञान पोस्ट - भविष्य का यथार्थ (लेखक - जिशान हैदर जैदी)
50.       वर्ष की श्रेष्ठ प्रस्तुति - कैप्टन मृगांक नंदन एण्ड टीम, पुणे
51.       वर्ष के श्रेष्ठ लेखक (हिन्दी चिट्ठाकारी विषयक पोस्ट) - श्री प्रमोद ताम्बट, भोपाल


हिन्‍दी ब्‍लॉग प्रतिभा सम्‍मान-२०११

इसके अंतर्गत ग्यारह ब्लॉगरों के नाम तय किये गए हैं , जिन्हें हिंदी ब्लॉगिंग में
दिए जा रहे विशेष योगदान के लिए हिन्‍दी ब्‍लॉग प्रतिभा सम्‍मान प्रदान किया जायेगा : -

(१)     श्री श्रीश शर्मा (ई-पंडित), तकनीकी विशेषज्ञ, यमुनानगर  (हरियाणा)
(२)   श्री कनिष्क कश्यप, संचालक ब्लॉगप्रहरी, दिल्ली
(३)   श्री शाहनवाज़ सिद्दिकी, तकनीकी संपादक, हमारीवाणी, दिल्ली
(४)   श्री जय कुमार झा, सामाजिक जन चेतना को ब्लॉगिंग से जोड़ने वाले ब्लॉगर, दिल्ली
(५)   श्री सिद्दार्थ शंकर त्रिपाठी, महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
(६)   श्री अजय कुमार झा, मीडिया चर्चा से रूबरू कराने वाले ब्लॉगर, दिल्ली
(७)   श्री रविन्द्र पुंज, तकनीकी विशेषज्ञ, यमुनानगर (हरियाणा)
(८)   श्री रतन सिंह शेखावत, तकनीकी विशेषज्ञ, फरीदाबाद (हरियाणा )
(९)   श्री गिरीश बिल्लौरे 'मुकुल', वेबकास्ट एवं पॉडकास्‍ट विशेषज्ञ, जबलपुर
(१०) श्री पद्म सिंह, तकनीकी विशेषज्ञ, दिल्ली
(११) सुश्री गीताश्री, नारी विषयक लेखिका, दि‍ल्ली

यूंही नजर पड़ गयी और बहुत अच्छा लगा उक्त समाचार पढ़कर. सभी को बधाई.....

Sunday, March 6, 2011

भगवा युद्ध.... भड़ास 4 मीडिया से साभार....

भगवा युद्ध : एक युद्ध राष्ट्र के विरुद्ध

: जेयूसीएस और फुट प्रिंट्स प्रस्तुति की फिल्म : अवधि - 61 मिनट :  इस फिल्म के निर्माण की शुरुआत 2005 में मऊ दंगे के रूप में पूर्वी उत्तर प्रदेश में हिंदुत्ववादियों द्वारा गुजरात दोहराने की कोशिश को समझाने के लिए हुई. इसके कुछ अंशों को अयोध्या फिल्म महोत्सव और इंडिया हैबिटेट सेंटर नई दिल्ली में प्रदर्शित किया जा चुका है. फिल्म के कुछ दृश्यों के आधार पर मानवाधिकार संगठनों ने योगी आदित्यनाथ के खिलाफ उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में मुक़दमा किया है.

गोरखनाथ पीठ सदियों से निचली श्रमिक जातियों की ब्राह्मणवाद विरोधी सांस्कृतिक चेतना का केंद्र रहा है. कालांतर में मुस्लिमों को एक हिस्सा भी इसके प्रभाव में आया और मुस्लिम जोगियों की एक धरा भी यहाँ से बह निकली. लेकिन पिछली एक सदी से यह पीठ सावरकर के हिन्दू राष्ट्र के सपने को साकार करने की प्रयोगस्थली बन गयी है. जिसके तहत 'हिन्दुओं के सैन्यकरण और अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने' का खाका खिंचा जा रहा है. इस विचार की अभियक्ति समझौता एक्सप्रेस, मालेगांव, मक्का मस्जिद, अजमेर समेत देश के कई हिस्सों में हुए आतंकिवादी विस्फोटों में हुई है. यह फिल्म समाज में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने के लिए की जा रही 'टेरर पोलिटिक्स' को समझाने का एक प्रयास है.
निर्देशक - राजीव यादव, शाहनवाज़ आलम, लक्ष्मण प्रसाद
परिकल्पना - शाहनवाज़ आलम, राजीव यादव, शरद जयसवाल, विजय प्रताप, शाह आलम
संपादन - राकेश कुमार, संदीप दुबे
सम्पर्क - 623/13 शंकरपुरी, कमता, पोस्ट-चिनहट,लखनऊ (उ.प्र.) 09415254919,09452800752

Wednesday, March 2, 2011

न्याय वही सही होता है जब हमारे पक्ष में होता है और हीरो वही होता है जो जीतता है ...

मेरे हिसाब से हम लोगों का एक जैसा ही मानना है कि न्याय वही सही है जब हमारे पक्ष में हो और नायक वही होता है जो जीतता है. हिटलर जीत जाता तो इतिहास और इतिहासकार उसकी दुहाई दे रहे होते और हेमू जीत जाता तो हेमू की गाथायें दर्ज होतीं. कौरव जीत गये होते तो शायद दुर्योधन के पक्ष में हम लोग तर्कों के बाण लेकर खड़े होते. आजकल बड़ी वितृष्ण सी हो रही है. किसी काम को करने की इच्छा नहीं हो रही है. नेता, अफसर सब एक जैसे. सब भाषण पिलाकर ही जनता को स्वस्थ करने की महती जिम्मेदारी निभा रहे हैं. आश्वासनों का चूर्ण बांटते हैं और कानून अपना काम करेगा, जैसे मधुर वाक्य कान में डालकर गरीबों की क्षुधा को शान्त करने की दिशा में पूर्ण प्रयास कर रहे हैं. गरीब भी उतना ही चालाक बन रहा है, अपना वोट यूं ही नहीं डालता!  कहीं नोट तो कहीं दारू और कहीं कपड़े. नूरा कुश्ती चालू है और यह भी कि कौन किसे बेवकूफ बना ले और कितनी अधिक मात्रा में.

Saturday, February 19, 2011

एक सलाह मजबूरी पर...

मनमोहन ने कर दिया, ताल ठोंक ऐलान
देखा होगा न  कहीं,  मुझ  जैसा इन्सान
मुझ जैसा इन्सान, घना मजबूर मैं दुखिया
कहने को मैं प्रधान,  नहीं हूं लेकिन मुखिया
कह दानव कविराय, जगो अब मोहन भैया
अर्धसत्य को त्याग, सत्य की खेवो नैया

Tuesday, February 15, 2011

राहत फतेह अली खान के पकड़ने और छूटने पर वेबसाइट पर प्रकाशित समाचार और कुछ लोगों के विचार...

अघोषित विदेशी मुद्रा ले जाने के आरोप में रविवार को गिरफ्तार पाकिस्तानी गायक राहत फतेह अली खान और उनके दोनों सहयोगियों को छोड़ दिया गया है। हालांकि उनका पासपोर्ट और अन्य कागजात राजस्व खुफिया निदेशालय ने जब्त कर लिए हैं इसलिए राहत वापस पाक नहीं जा पाएंगे। राहत को 17 फरवरी को दोबारा पूछताछ के लिए हाजिर होने को कहा गया है।
निदेशालय ने कहा कि राहत को आधिकारिक रूप से गिरफ्तार नहीं किया गया था। वे केवल हिरासत में थे। पहले निदेशालय के अफसरों ने कहा था कि कस्टम कानून के तहत राहत को गिरफ्तार कर लिया गया है। लेकिन बताया जाता है कि राहत की गिरफ्तारी के बाद पाकिस्तान की ओर से बने कूटनीतिक दबाव ने अपना काम किया और राहत को छोड़ दिया गया
पाकिस्तानी संगीतकार व गायक अली जफर ने कहा कि यह दुखद है। मुझे घटना के विषय में विस्तृत जानकारी नहीं है, मैं नहीं जानता कि कैसे, क्या हुआ। 
निर्देशक और संगीतकार विशाल भारद्वाज ने कहा कि जो कुछ हुआ वह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि वह सबसे पहले एक कलाकार हैं। हम सभी जानना चाहेंगे कि वास्तविक सच क्या है। राहत फतेह अली खान सिर्फ पाकिस्तान से ही ताल्लुक नहीं रखते हैं, वह भारत के महान गायकों में से भी एक हैं।उन्होंने कहा कि अगर कुछ हुआ है तो भी वह एक कलाकार हैं इसलिए उन्हें प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहिए। उन्हें वापस जाने की इजाजत दी जानी चाहिए। वह एक ऐसे कलाकार हैं जो दोनों देशों में सम्मानित हुए हैं।
विदेशी करंसी के साथ इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर पकड़े गए पाकिस्तानी गायक राहत फतेह अली खान को राहत मिल सकती है। सूत्रों के मुताबिक डीआरआई(राजस्व निदेशालय) राहत के खिलाफ कस्टम एक्ट के कड़े कानून की बजाए भारी जुर्माना लगाने पर विचार कर रहा है। राहत को रविवार शाम दिल्ली एयरपोर्ट से सवा लाख डॉलर के साथ पकड़ा गया था।डीआरआई की पूछताछ में इस प्रख्यात गायक ने अपने बचाव में अजीबोगरीब दलील दी। राहत ने कहा कि वो सिर्फ पांचवीं तक पढ़े हैं इसलिए उन्हें भारतीय कानून की जानकारी नहीं थी। यही वजह है कि वो इतना पैसा ले जा रहे थे।
सूत्रों के मुताबिक राहत फतेह अली खान पहले भी भारी तादाद विदेशी करेंसी ले जा चुके हैं। एजेंसियों ने उन्हें इस बारे में चेतावनी भी दी थी। तभी से राहत और उनके मैनेजर की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी।
अपनी गलती की वजह से फंसे राहत को आने वाले दिनों में इन दोनों पार्टियों के भारी विरोध का सामना करना पड़ सकता है।
भारतीय कलाकारों के लिये पाकिस्तान में क्या नियम-कानून लागू किये जाते हैं, किसी से ढ़ंका-छुपा नहीं है, लेकिन फिर भी.........

Sunday, February 13, 2011

क्या हमें बाहर से किसी धक्के की आवश्यकता है..?

महबूबा मुफ्ती एक पावर प्वाइंट प्रजेन्टेशन में कश्मीर के कुछ हिस्सों को चीन और पाकिस्तान का मान रही हैं. विजन आन कश्मीर नाम के इस प्रजेन्टेशन में महबूबा श्रीनगर को चीन के यारकंद से जोड़ना चाहती हैं. चीन पहले ही कश्मीर को विवादित मानता आ रहा है और कश्मीर तथा अरुणाचल के निवासियों को अलग से नत्थी कागज पर वीसा देने का प्रयास करता आया है. महबूबा मुफ्ती के इस नये कदम से पाकिस्तान और चीन का मनोबल निश्चित रूप से बढ़ेगा और अलगाववादियों का मनोबल भी. भारत की अखंडता पर खतरा किन लोगों से है, शायद अब तो साफ हो जाना चाहिये. भेड़िया आया, भेड़िया आया का शोर मचाकर बहुत दिनों तक किसी को बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता और न ही  आंख मूंदने से खतरा दूर हो जाता है. सिर्फ आशा कर सकता हूं कि HOAX पर खामखाह जनता का ध्यान केन्द्रित न कराया जा जायेगा और आसन्न सच्चे खतरे को भांपकर उस पर कड़ी कार्रवाई की जायेगी. यदि इसे भी व्यर्थ का प्रलाप मानते हुये कड़ी कार्रवाई नहीं की जाती तो देश की अखंडता के ऊपर गम्भीर खतरा मंडरा रहा है..
यद्यपि भारत के कई हिस्सों पर पाकिस्तान और चीन ने कब्जा कर रखा है, लेकिन कब्जा होने के कारण से ही हम उसे अपने नक्शे से निकाल नहीं सकते. और यह तो फिर हमारी अस्मिता, हमारी पहचान की बात है. आज को कश्मीर के हिस्से, कल को देश का कोई और टुकड़ा हो सकता है, वह भी जिसमें हम आप रहते हैं. 

Wednesday, February 2, 2011

आईटीबीपी भर्ती से लौट रहे लड़कों के साथ शाहजहांपुर में विकराल हादसा.

बरेली में आईटीबीपी में ट्रेड़मैन की भर्ती होना थी. जिसके लिये ग्यारह प्रान्तों से लड़के आये थे. एक लाख संख्या बताई जाती है. पिछले दो दिनों से बरेली में थे. इससे पहले सम्भवत: उनतीस तारीख से आला हजरत का उर्स था जिसके चलते भी पांच लाख जायरीन देश भर से आये थे. इतनी बड़ी भीड़ को नियन्त्रित करने के लिये ठोस और व्यापक इन्तजामों की आवश्यकता थी.

Sunday, January 30, 2011

गारन्टी-वारन्टी क्या है...

दुकान पर कोई भी चीज खरीदिये, विशेषत: इलेक्ट्रिकल या इलेक्ट्रानिक्स की. हर दुकानदार सामान बेचते समय उसकी खासियत बताता है और फिर गारन्टी या वारन्टी के बारे में.  पहले लोग बताते थे कि गारन्टी वह वचन होता है जो निर्माता वस्तु के ग्राहक को उस चीज के निजी उपयोग में लाने पर एक निश्चित समयावधि के अन्दर वस्तु में कोई खोट आने पर उस वस्तु को बदलने के लिये देता है. हालांकि गारन्टी के साथ भी कई शर्तें जुड़ी रहती हैं. और यह इतनी अधिक होती हैं, इतने महीन अक्षरों में दर्ज होती हैं और ऐसी भाषा में लिखी होती हैं कि लाखों में बिरला ही इन शर्तों को पढ़ता होगा. वारन्टी के बारे में लोगों ने यह बताया कि गारन्टी के स्थान पर यह नया शब्द वारन्टी आया है और वारन्टी में आवश्यक नहीं कि वस्तु बदलकर दूसरी वस्तु प्रदान की जाये, बल्कि उसी वस्तु को सुधारकर दिया जायेगा.
अब असल मुद्दे पर आते हैं. माना मैंने एक मिक्सी खरीदी 01-01-2011 को. इस पर वारन्टी या गारन्टी है छ: महीने की. अर्थात 31-06-2011 तक यह मिक्सी गारन्टी या वारन्टी में है. इस दौरान 25-06-2011 को यह खराब हो जाती है.  मैं इस मिक्सी को दुकानदार को या फिर सर्विस सेन्टर को दे देता हूं. अब मुझे यह रिपेयर्ड या नई मिक्सी दी जाती है 20-07-2011 को. मैं यह जानना चाहता हूं कि क्या भारत में प्रचलित नियमों के अनुसार इस रिपेयर्ड या नई मिक्सी पर गारन्टी या वारन्टी 20-07-2011 से आगे छ: महीने के लिये वैध होगी या नहीं.

Saturday, January 29, 2011

ताऊ. डाट इन पर कमेन्ट डिस-एबल्ड !

Tuesday, January 25, 2011

फिर इन नामों को लाने का क्या लाभ

अभी टेलीविजन पर देख रहा हूं , एक परिचर्चा चल रही है कालेधन की वापसी को लेकर. यह बताया जा रहा है कि विदेशी बैंकों ने हमारे देश को कालाधन जमा करने वाले लोगों की सूची इस शर्त के साथ दी है कि हमारे यहां इन लोगों के नामों का खुलासा नहीं किया जायेगा. यदि इन नामों का खुलासा होना ही नहीं है तो फिर इन नामों को लाने का क्या लाभ. 

Saturday, January 15, 2011

राह चलते कुछ चित्र

साथ चलते चलते अचानक दोराहे पर जब हमसफर की राह अलग हो जाये तो ?