जो मन में आया वह सब आपके सामने. सर पर मैला ढ़ोते लोगों को देखकर मन कराह उठता है. मुझे लगता है कि सहानुभूति के स्थान पर स्वानुभूति अपनाना बेहतर है. बढ़ती जनसंख्या, पर्यावरण का विनाश और पानी की बर्बादी बहुत तकलीफ देती है. दर्द उस समय और भी बढ़ जाता है जब कानून का पालन कराने वाले ही उसे तुड़वाते हैं.
Monday, February 20, 2012
Saturday, February 18, 2012
Wednesday, February 15, 2012
सैकड़ों की संख्या में ख़बरें और मंहगाई दर.
हर कोई चैनल सबसे कम समय में सबसे अधिक ख़बरें दिखाने का दावा करता है. कोई मिनट के हिसाब से तो कोई संख्या के हिसाब से. मानो कोई जलजला आ गया हो खबरों का. और एंकर तो बिलकुल किसी युद्ध के मोर्चे पर लाईट मशीनगन लेकर तैनात फौजी की तरह खबरों की गोली दागता रहता है. निरीह दर्शक, जिसके आँखों-कानों में दर्जन और सैकडे के हिसाब से ख़बरें घुसेड़ने का पुरजोर प्रयास किया जाता है, चुपचाप मूकदर्शक बनकर बैठा रहता है. कोई कहता है कि गोली की रफ्तार से ख़बरें देखिये तो कोई एक मिनट में सैकड़ा पूरा करने की बात कहता है. पता नहीं ये खबरें दिखाना चाहते हैं या फिर गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्शकों के दिमाग में ख़बरें घुसेड़ने का रिकार्ड बनाना चाहते हैं.
दूसरा तिलिस्म यह समझ में नहीं आता कि दर कम होती है लेकिन मंहगाई बढती जाती है. ये कौन सा अर्थ या अनर्थ शास्त्र है जिसमें सप्लाई बढ़ने पर भी मंहगाई बढती है और घटने पर भी. ये कौन सा चमत्कार है कि मंहगाई की दर तो दूरदर्शन पर कम होती मालूम चलती है, लेकिन दूध-दही, आटा-दाल, शिक्षक-डाक्टर की फीस वैसी की वैसी ही. घर के बजट में बचत का अंश आंशिक मात्रा की तरफ चला जा रहा है. अभी नेताओं की संपत्ति पढ़ रहा था. कुछ के विषय में पढ़कर आंसू आ गए. बेचारे, एक भी कार नहीं, एक भी गाड़ी उनके अपने नाम नहीं. अब पत्नी-बच्चों की बात मत करें. सिद्धांत की बात है, पत्नी भले मर्सिडीज पर चले लेकिन नेताजी तो पैदल ही चलेंगे.
एक फार्मूला था जो बड़ा गोपनीय था, जिसे सिद्ध करने के लिए कई वर्ष घोर तपस्या करनी पड़ती थी, तब जाकर कहीं कोई देवी-देवता प्रसन्न होते थे और सिद्धि प्रदान करते थे. हमारे पाँच पीढियों पूर्व के पुरखे ने एक बार एक को सिद्ध कर लिया और उसके बाद उनका एक रूपया हर वर्ष दस रुपये में बदलता रहा. लेकिन इस सिद्धि की एक लिमिट भी थी. ये आशीर्वाद केवल पाँच साल तक चलता था.
सैकड़ों की संख्या में ख़बरें और मंहगाई दर.
हर कोई चैनल सबसे कम समय में सबसे अधिक ख़बरें दिखाने का दावा करता है. कोई मिनट के हिसाब से तो कोई संख्या के हिसाब से. मानो कोई जलजला आ गया हो खबरों का. और एंकर तो बिलकुल किसी युद्ध के मोर्चे पर लाईट मशीनगन लेकर तैनात फौजी की तरह खबरों की गोली दागता रहता है. निरीह दर्शक, जिसके आँखों-कानों में दर्जन और सैकडे के हिसाब से ख़बरें घुसेड़ने का पुरजोर प्रयास किया जाता है, चुपचाप मूकदर्शक बनकर बैठा रहता है. कोई कहता है कि गोली की रफ्तार से ख़बरें देखिये तो कोई एक मिनट में सैकड़ा पूरा करने की बात कहता है. पता नहीं ये खबरें दिखाना चाहते हैं या फिर गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्शकों के दिमाग में ख़बरें घुसेड़ने का रिकार्ड बनाना चाहते हैं.
दूसरा तिलिस्म यह समझ में नहीं आता कि दर कम होती है लेकिन मंहगाई बढती जाती है. ये कौन सा अर्थ या अनर्थ शास्त्र है जिसमें सप्लाई बढ़ने पर भी मंहगाई बढती है और घटने पर भी. ये कौन सा चमत्कार है कि मंहगाई की दर तो दूरदर्शन पर कम होती मालूम चलती है, लेकिन दूध-दही, आटा-दाल, शिक्षक-डाक्टर की फीस वैसी की वैसी ही. घर के बजट में बचत का अंश आंशिक मात्रा की तरफ चला जा रहा है. अभी नेताओं की संपत्ति पढ़ रहा था. कुछ के विषय में पढ़कर आंसू आ गए. बेचारे, एक भी कार नहीं, एक भी गाड़ी उनके अपने नाम नहीं. अब पत्नी-बच्चों की बात मत करें. सिद्धांत की बात है, पत्नी भले मर्सिडीज पर चले लेकिन नेताजी तो पैदल ही चलेंगे.
एक फार्मूला था जो बड़ा गोपनीय था, जिसे सिद्ध करने के लिए कई वर्ष घोर तपस्या करनी पड़ती थी, तब जाकर कहीं कोई देवी-देवता प्रसन्न होते थे और सिद्धि प्रदान करते थे. हमारे पाँच पीढियों पूर्व के पुरखे ने एक बार एक को सिद्ध कर लिया और उसके बाद उनका एक रूपया हर वर्ष दस रुपये में बदलता रहा. लेकिन इस सिद्धि की एक लिमिट भी थी. ये आशीर्वाद केवल पाँच साल तक चलता था.
दूसरा तिलिस्म यह समझ में नहीं आता कि दर कम होती है लेकिन मंहगाई बढती जाती है. ये कौन सा अर्थ या अनर्थ शास्त्र है जिसमें सप्लाई बढ़ने पर भी मंहगाई बढती है और घटने पर भी. ये कौन सा चमत्कार है कि मंहगाई की दर तो दूरदर्शन पर कम होती मालूम चलती है, लेकिन दूध-दही, आटा-दाल, शिक्षक-डाक्टर की फीस वैसी की वैसी ही. घर के बजट में बचत का अंश आंशिक मात्रा की तरफ चला जा रहा है. अभी नेताओं की संपत्ति पढ़ रहा था. कुछ के विषय में पढ़कर आंसू आ गए. बेचारे, एक भी कार नहीं, एक भी गाड़ी उनके अपने नाम नहीं. अब पत्नी-बच्चों की बात मत करें. सिद्धांत की बात है, पत्नी भले मर्सिडीज पर चले लेकिन नेताजी तो पैदल ही चलेंगे.
एक फार्मूला था जो बड़ा गोपनीय था, जिसे सिद्ध करने के लिए कई वर्ष घोर तपस्या करनी पड़ती थी, तब जाकर कहीं कोई देवी-देवता प्रसन्न होते थे और सिद्धि प्रदान करते थे. हमारे पाँच पीढियों पूर्व के पुरखे ने एक बार एक को सिद्ध कर लिया और उसके बाद उनका एक रूपया हर वर्ष दस रुपये में बदलता रहा. लेकिन इस सिद्धि की एक लिमिट भी थी. ये आशीर्वाद केवल पाँच साल तक चलता था.
Sunday, February 12, 2012
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