Friday, March 7, 2014

नैनों से नैनों तक.....

नैनों से नैनों तक पहुंची
कितनी सुन्दर भाषा प्रेम
दिल से दिल के तार जोड़ती
बस इतनी परिभाषा प्रेम
लैला-मजनूं, मीरा-नटवर
सबके मन की आशा प्रेम
चाँद-चकोरी, शमां-पतंगा
हर एक की प्रत्याशा प्रेम
पत्थर के दिल मोम बना दे
कुछ ऐसी ही भाषा प्रेम
चार दिनों के इस जीवन में
आँसू कभी दिलासा प्रेम
जवां दिलों के मीठे सपने
सबकी यह अभिलाषा प्रेम
मन से मन का है ये नाता
तन की जिज्ञासा प्रेम
धर्म का बंधन देश की सीमा
सबसे है निरबासा प्रेम...

11 comments:

  1. सच हर मन की भाषा, हर मन की आशा है प्रेम..... बहुत सुंदर रचना

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  2. प्रेम के सारे कोण आपने प्रस्तुत कर दिये... परमात्मा की सबसे बड़ी देन!!

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  3. प्रेम धुरी है, विश्व घूमता है।

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  4. बदले बदले से सरकार नज़र आते हैं :)

    पते की बात है प्रभु!!

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  5. मन से मन का है ये नाता
    न तन की जिज्ञासा प्रेम
    धर्म का बंधन देश की सीमा
    सबसे है निरबासा प्रेम
    … बहुत सही कहा आपने... …
    सुन्दर रचना !

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  6. प्रेम के विषय में जितना कहा जाय उतना कम..सुंदर प्रस्तुति।।।

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मैंने अपनी बात कह दी, आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा है. अग्रिम धन्यवाद.