कुछ महीनों पहले किसान ने गेहूँ बेचा था ११०० रुपये कुंतल. इस समय यही गेहूँ बिक रहा है १५०० रुपये को और आटा पहुँच गया है २५ रुपये किलो. तस्वीर बिलकुल साफ है, किसान का सब गेहूँ पहले ही बिक चुका है, बल्कि कहिये कि किसान को तो हर हाल में अपनी फसल को बेचना ही है, क्योंकि उसपर कर्ज है, उसके पास स्टोरेज नहीं है. सारा गेहूँ बिचौलियों ने खरीद लिया और अब वही गेहूँ पैंतीस प्रतिशत मुनाफे पर बाजार में बिक्री हेतु उपलब्ध है. आटे की शक्ल में पहुँचते पहुँचते दुगुने से ऊपर. इस भ्रष्टाचार पर कौन नकेल लगायेगा. तिस पर मंत्री जी कहते हैं कि महंगाई अच्छी है, किसान को फायदेमन्द है. पता नहीं वह कौन सा फार्मूला है जिससे किसानों को लाभ मिल रहा है और वे कौन से किसान हैं जिन्हें लाभ मिल रहा है.