Need Baraha full version...6.0....
जो मन में आया वह सब आपके सामने. सर पर मैला ढ़ोते लोगों को देखकर मन कराह उठता है. मुझे लगता है कि सहानुभूति के स्थान पर स्वानुभूति अपनाना बेहतर है. बढ़ती जनसंख्या, पर्यावरण का विनाश और पानी की बर्बादी बहुत तकलीफ देती है. दर्द उस समय और भी बढ़ जाता है जब कानून का पालन कराने वाले ही उसे तुड़वाते हैं.
Monday, October 10, 2016
Sunday, October 9, 2016
Test Post...Need Baraha.. 6.0 or any previous full version...
Need Baraha 6.0 or any other hindi IME compatible to windows 8/10 ...
Saturday, March 29, 2014
धन्य धन्य भारत के लोग ...
भारत का एक हर्क्युलिस दुर्घटनाग्रस्त हो गया और भारत के ही कुछ लोगों ने इस जहाज में से अपने काम की चीजें निकालना प्रारम्भ कर दिया. पुलिस वाले भी बेचारे क्या करते आखिर लोकतन्त्र में लोगों की इच्छा ही तो सर्वोपरि है. जस्टिस काटजू ने एक बार नब्बे प्रतिशत भारतीयों के लिये एक बात कह दी थी जो बहुत ही अखरी, लेकिन यह घटनायें क्या जस्टिस काटजू को सही सिद्ध नहीं करतीं.
ईश्वर अगर आज साक्षात इस जमीन पर अवतरित होते तो सम्भवत: इस प्रकार के कानूनों को रद्द करा देते जिन कानूनों के तहत साक्ष्य की आवश्यकता न हो. ईशनिन्दा कानून के अन्तर्गत न तो साक्ष्यों की ही जरूरत होती है और न ही झूठा आरोप लगाने वालों को किसी प्रकार के भी दण्ड इत्यादि की कोई व्यवस्था है. पूरे विश्व को इस प्रकार के कानूनों पर एक बार पुनर्विचार करने की आवश्यकता है.
Saturday, March 22, 2014
मुर्गा और संविधान में प्रदत्त बन्धुत्व और गरिमा...
कल मेरे एक मित्र ने मुझसे संविधान की प्रस्तावना के बारे में पूछा था. उन्हें पूरी याद थी और मैं भूल चुका था. इसमें समाजवादी प्रभुत्व सम्पन्न, बन्धुत्व और गरिमा जैसे बड़े बड़े शब्द थे और आत्मार्पित करने जैसा गुरुतर दायित्व.
आज एक चौराहे पर दो लड़के मोटरसाइकिल से जा रहे थे, दीवान जी और सिपाही जी ने उन्हें रोक लिया. कागजातों में कोई कमी थी. जिस पर उस लड़के को यह मुर्गा बनने का लघुतम दन्ड देकर छोड़ दिया. दूर कई सज्जन(?) हंस रहे थे. बन्धुत्व और गरिमा संविधान की प्रस्तावना में शोभा बढा रहे थे.
शायद सब-इन्स्पेक्टर से नीचे का कोई पुलिस कर्मी कागजात चेक नहीं कर सकता लेकिन दीवान जी चेकिंग कर रहे थे . किस कानून के अन्तर्गत कागजातों में कमी होने पर मुर्गा बनाने का दन्ड आरोपित किया जा सकता है.
और यह सब वही पुलिस कर्मी होते हैं जिनके सामने धड़ल्ले से ओवर लोडिड आटो-बसें सड़कों को रौंदते हुये गुजरते रहते हैं.
Friday, March 7, 2014
नैनों से नैनों तक.....
नैनों से
नैनों तक पहुंची
कितनी सुन्दर
भाषा प्रेम
दिल से
दिल के तार
जोड़ती
बस इतनी
परिभाषा प्रेम
लैला-मजनूं, मीरा-नटवर
सबके मन
की आशा प्रेम
चाँद-चकोरी, शमां-पतंगा
हर एक
की प्रत्याशा प्रेम
पत्थर के
दिल मोम बना
दे
कुछ ऐसी
ही भाषा प्रेम
चार दिनों
के इस जीवन
में
आँसू कभी
दिलासा प्रेम
जवां दिलों
के मीठे सपने
सबकी यह
अभिलाषा प्रेम
मन से
मन का है
ये नाता
न तन
की जिज्ञासा प्रेम
धर्म का
बंधन देश की
सीमा
सबसे है निरबासा प्रेम...
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