Saturday, March 29, 2014

धन्य धन्य भारत के लोग ...

भारत का एक हर्क्युलिस दुर्घटनाग्रस्त हो गया और भारत के ही कुछ लोगों ने इस जहाज में से अपने काम की चीजें निकालना प्रारम्भ कर दिया.  पुलिस वाले भी बेचारे क्या करते आखिर लोकतन्त्र में लोगों की इच्छा ही तो सर्वोपरि है. जस्टिस काटजू ने एक बार नब्बे प्रतिशत भारतीयों के लिये एक बात कह दी थी जो बहुत ही अखरी, लेकिन यह घटनायें क्या जस्टिस काटजू को सही सिद्ध नहीं करतीं.

ईश्वर अगर आज साक्षात इस जमीन पर अवतरित होते तो सम्भवत: इस प्रकार के कानूनों को रद्द करा देते जिन कानूनों के तहत साक्ष्य की आवश्यकता न हो.  ईशनिन्दा कानून के अन्तर्गत न तो साक्ष्यों की ही जरूरत होती है और न ही झूठा आरोप लगाने वालों को किसी प्रकार के भी दण्ड इत्यादि की कोई व्यवस्था है. पूरे विश्व को इस प्रकार के कानूनों पर एक बार पुनर्विचार करने की आवश्यकता है.

Saturday, March 22, 2014

मुर्गा और संविधान में प्रदत्त बन्धुत्व और गरिमा...

कल मेरे एक मित्र ने मुझसे संविधान की प्रस्तावना के बारे में पूछा था. उन्हें पूरी याद थी और मैं भूल चुका था. इसमें समाजवादी प्रभुत्व सम्पन्न, बन्धुत्व और गरिमा जैसे बड़े बड़े शब्द थे और आत्मार्पित करने जैसा गुरुतर दायित्व.
आज एक चौराहे पर दो लड़के मोटरसाइकिल से जा रहे थे, दीवान जी और सिपाही जी ने उन्हें रोक लिया. कागजातों में कोई कमी थी. जिस पर उस लड़के को यह मुर्गा बनने का लघुतम दन्ड देकर छोड़ दिया. दूर कई सज्जन(?) हंस रहे थे. बन्धुत्व और गरिमा संविधान की प्रस्तावना में शोभा बढा रहे थे.
शायद सब-इन्स्पेक्टर से नीचे का कोई पुलिस कर्मी कागजात चेक नहीं कर सकता लेकिन दीवान जी चेकिंग कर रहे थे . किस कानून के अन्तर्गत कागजातों में कमी होने पर मुर्गा बनाने का दन्ड आरोपित किया जा सकता है.
और यह सब वही पुलिस कर्मी होते हैं जिनके सामने धड़ल्ले से ओवर लोडिड आटो-बसें सड़कों को रौंदते हुये गुजरते रहते हैं. 

Friday, March 7, 2014

नैनों से नैनों तक.....

नैनों से नैनों तक पहुंची
कितनी सुन्दर भाषा प्रेम
दिल से दिल के तार जोड़ती
बस इतनी परिभाषा प्रेम
लैला-मजनूं, मीरा-नटवर
सबके मन की आशा प्रेम
चाँद-चकोरी, शमां-पतंगा
हर एक की प्रत्याशा प्रेम
पत्थर के दिल मोम बना दे
कुछ ऐसी ही भाषा प्रेम
चार दिनों के इस जीवन में
आँसू कभी दिलासा प्रेम
जवां दिलों के मीठे सपने
सबकी यह अभिलाषा प्रेम
मन से मन का है ये नाता
न तन की जिज्ञासा प्रेम
धर्म का बंधन देश की सीमा
सबसे है निरबासा प्रेम...

Sunday, August 25, 2013

क्या हमारे यहाँ सही अर्थों में लोकतन्त्रिक व्यवस्था लागू है?

हम लोग अपने सांसद-विधायकों को चुनते हैं. पहली बात तो यह कि मतदान का प्रतिशत औसत ४०-४५% रहता है. उसके बाद इसमें आधे से अधिक मत जीतने वाले के अलावा अन्य प्रत्याशियों में बंट जाते हैं, मतलब यह कि कुल मतों का १५-२०% पाने वाले प्रत्याशी को जीत हासिल हो जाती है, फिर इसका ५१% वाले सत्ता पा जाते हैं. सार यह कि सत्ता किसे देनी है यह कुल मतों के दसवें हिस्से से निर्धारित होता है. 

अब आते हैं दूसरी बात पर.  लोकतन्त्र की दुहाई देने वाले राजनीतिक दल मतदाताओं के लिये तो लोकतान्त्रिक व्यवस्था की बात करते हैं लेकिन उनके स्वयं के अन्दर न तो पारदर्शिता है और न ही कोई लोकतान्त्रिक व्यवस्था. पारदर्शिता के नाम पर एक मात्र अधिनियम सूचना का अधिकार अधिनियम, २००५ है जिसके दायरे में कोई राजनीतिक दल नहीं रहना चाहता. क्यों? क्या राजनीतिक दलों के पदाधिकारी/ कार्यकर्ता भारत के नागरिक नहीं हैं. वे स्वयं सूचना माँग सकते हैं लेकिन सूचना देने में इतना कष्ट!

मूल मुद्दा था लोकतान्त्रिक व्यवस्था का. आमतौर पर सबसे बड़े दल के सांसद/विधायक दल का नेता सरकार बनाने का दावा करता है. लेकिन इन दलों में नेता कैसे चुना जाता है? बड़ी बात यह है कि लोकतन्त्र की दुहाई देने वाले अधिकतर दलों के पदाधिकारियों में चुनाव न कर मनोनयन किया जाता है. और इन दलों के अन्दर कोई ऐसी व्यवस्था नहीं कि चुनाव होने के बाद लोकतान्त्रिक तरीके से अपने दल के नेता का चुनाव किया जाये. कहीं सांसद/विधायक यह कह देते हैं कि हमारे दल के मुखिया जिसे चुनेंगे वह स्वीकार्य होगा. कहीं पहले से ही किसी व्यक्ति को बतौर मुखिया प्रोजेक्ट कर दिया जाता है. क्या लोकतन्त्र केवल आम मतदाता के लिये है, दलों में लोकतन्त्र नहीं होना चाहिये.

ऐसे में जो मुखिया बनता है वह चुना हुआ कहाँ से हुआ, और जब उसका चुनाव सीधे नहीं हुआ तो फिर किसके प्रति उत्तरदायी हुआ. इससे तो बेहतर है कि राज्य और देश के प्रमुख का चुनाव भी सीधे ही जनता के द्वारा कराया जाये जिससे कम से कम जनता और मुखिया दोनों ही एक दूसरे के प्रति सीधे ही उत्तरदायी हो सकें.