Friday, December 9, 2011

कई महीनो के बाद अपने अकाउंट में लाग-इन !

आज मैं कई महीनो के बाद अपने अकाउंट को लाग-इन कर सका. ubuntu linux को इन्स्टाल कर लिया है. 3G मोडेम बढ़िया कार्य कर रहा है. लेकिन एक दो कठिनाईयां हैं. पहला कि बराहा को कैसे इन्स्टाल किया जाए जिससे कि मैं रोमन में टाइप कर हिंदी लिख सकूं तथा दूसरा यह कि skpye किस तरह से इन्स्टाल हो गया और इसमें usb वेब-कैम कैसे इन्स्टाल हो सकेगा.  

Monday, September 12, 2011

मेरे सिस्टम में वायरस आ गया है.............

पिछले दिनों एक साइट नहीं खुल रही थी, उसे खोलने के लिये फायरबाल को डी-एक्टीवेट क्या किया, मानो आफत आ गयी. दोबारा वह फायरबाल एनेबल नहीं हुई. अन्दर सिस्टम में देखा तो हिडन फाइलें दिखना बन्द हो गयीं. फिर "हिडन फाइलें" दिखाने वाला आप्शन क्लिक किया तब वह फाइलें दिखाई दीं, लेकिन अगले क्षण फिर वही पुरानी स्थिति.
इसमें होता यह है कि एक "autorun.inf" फाइल बनती है जो एक बार तो डिलीट हो जाती है, लेकिन दोबारा डिलीट नहीं होती. इसके अन्दर जो प्रोग्राम होता है वह एक रैन्डम फाइल बनाता है जिसका एक्स्टेंशन ".pif" या ".exe" होता है. मैं अपने सिस्टम  की C Drive को कई बार फार्मेट कर विन्डोज इन्स्टाल कर चुका हूं, लेकिन यह वायरस मंहगाई की भांति पीछा ही नहीं छोड़ रहा.

अवीरा स्कैन करने पर कई ठीक ठाक फाइलों को वायरस युक्त बताकर तुरन्त उड़ा देता है. और अवास्त का भी यही हाल है. वह फाइलों को अपने वाल्ट में भेज देता है. मालवेयर बाइट्स वायरस को अन्य फाइलों तक पहुंचने से तो रोकता है लेकिन इस वायरस  को खत्म नहीं करता. पता नहीं यह मुआ कहां छुप जाता है तिलचट्टे की भांति. स्पाइबोट - सर्च एन्ड डेस्ट्रोय तो इन्स्टाल ही नहीं हो पाया इस वायरस के चलते.

एक स्थान पर पाया कि इसका नाम Malware.Packer.Gen है तो अन्य स्थान पर यह win32.sality के नाम से प्रसिद्ध है. कैसे इसका आक्रमण बन्द हो. कुछ सुझाइये.

Sunday, September 11, 2011

हमारे प्रधान जी एकदम ठीक कर रहे हैं.

एक बम क्या फट गया, मानों आफत आ गयी. जिसे देखो वही कट्टरपंथियों के हाथों खेलने लगा और अपनी भड़ास उतारने लगा. लेकिन मैं प्रधान जी के साथ हूं. वह हमारे देश के गौरवशाली अतीत और परम्पराओं का निर्वहन कर रहे हैं. विश्वास नहीं होता. अब देखिये, हमारे ही बड़े बूढ़े कह गये हैं कि गोली के घाव से भी अधिक तीखा होता है बोली का घाव. इसीलिये आतंक और आतंकवादियों तथा उनके मददगारों के विरुद्ध बोली का प्रयोग कर रहे हैं. बिल्कुल छलनी हो जायेंगे हमारे बयानों से. और हम आतंकवादियों को कोस भी तो रहे हैं. जब मरी खाल की श्वांस से लोहा भी भस्म हो जाता है तो हमारी आहों से ये आतंकवादी कैसे बच जायेंगे. रोज करें ऐसी कायराना हरकत. हम इन कायराना हरकतों से डरते नहीं हैं, देखा दिल्ली कहीं रुकी, मुम्बई कहीं रुकी. ये है हमारी जिन्दादिली.  बयान संप्रेक्षण चालू आहे.

Sunday, August 28, 2011

डा० अमर कुमार और शम्मी कपूर - अब स्वर्गीय.

कल बन्धु श्री अनुराग शर्मा जी के फेसबुक अपडेट से पता चला कि डा०अमर नहीं रहे. बड़ा धक्का लगा. कुछ समय से रोग-ग्रसित थे किन्तु इसके बावजूद उनकी जिन्दादिली में कोई कमी नहीं आई थी. इटैलिक्स में लिखी उनकी टिप्पणियां जिसमें कभी भोजपुरी तो कभी पंजाबी और कभी अंग्रेजी का शानदार तड़का लगा होता था, सत्य को प्रतिबिम्बित करती थीं. माडरेशन के विरुद्ध रहे और अपनी बात को पूरी दृढ़ता से सामने रखते रहे. साहसी, निर्भय, लाग-लपेट से दूर, जैसा कि मैंने हमेशा पाया. एक-दम खरी बात कहने और सुनने के आदी. बहुत धारदार लेखन. पैना, जीवंत, जब व्यंग्य करते, तो सामने वाले को उसकी तीक्ष्णता का अहसास होता.  बहुत कुछ लिखने के लिये बैठा था, लेकिन न लिख सका. आपकी बहुत आवश्यकता थी हमें, लेकिन लगता है कि हमसे अधिक आवश्यकता ईश्वर को थी. आपको नमन.


इससे कुछ दिनों पहले शम्मी कपूर के निधन की खबर पढ़ी.  बहुत छोटा था तो शायद जंगली देखी थी, श्वेत - श्याम टेलीविजन पर. उसका गीत "चाहे कोई मुझे जंगली कहे" जुबान पर चढ़ गया था. शम्मी जी को पर्दे पर देखता तो लगता कि काश मैं भी ऐसा बन सकूं, हर समय ऊर्जा से ओत-प्रोत युवक. मानो उनके अन्दर कोई ऐसी बैटरी लगी थी जो हर समय ही फुल चार्ज्ड रहती. आखिर कोई व्यक्ति कैसे इतना ऊर्जावान, इतना मस्त हो सकता है.  बाद में यह समझ में आया कि पर्दे पर तो एक कैरेक्टर प्ले करना पड़ता है अभिनेता को. उसके बाद भी मेरे मन से वह छवि कभी विखंडित नहीं हुई. बल्कि उस छवि से मैं निरन्तर ऊर्जा प्राप्त करता रहा. पत्र - पत्रिकाओं से पता चलता रहा कि शम्मी जी कभी रिटायर नहीं हुये, बल्कि हमेशा अपने लिये नये जमाने के साथ जोड़े रहे. मृत्यु एक अटल सत्य है. समय के इस दरिया में न जाने कितने लोग प्रवाहित हो गये और रह गयीं तो सिर्फ यादें.

Saturday, August 13, 2011

पिछले दिनों जिन चीजों ने झकझोरा

उत्तर प्रदेश में भूमि अधिग्रहण  व्यवस्था में संशोधन कर दिया गया है, अब सरकार जिस  जमीन को अधिग्रहीत कर लेगी उसे कभी वापस नहीं किया जा सकेगा, फिर वह जमीन वर्षों तक बेकार ही क्यों न पड़ी रहे. विपक्ष अब चिल्ला  रहा है कि कैसा संशोधन पारित हो गया.

कांवरिये बरसों से जिस  मार्ग से निकलते आते रहे हैं, उस इलाके में अल्पसंख्यकों (मुस्लिमों) की  संख्या  बढ़ जाए तो फिर कांवरियों के  निकलने से भावनाएं आहत होती हैं, किन्तु हिन्दुओं की अधिकता वाले  इलाकों में निर्धारित  मार्ग से ताजियों के निकलने से हिन्दुओं को कोई परेशानी नहीं होती.

एक पत्रकार कह रहे हैं कि अन्ना ने चार लाख फ़ार्म बांटे, लेकिन अस्सी हजार वापस मिले अर्थात  लोगों ने अन्ना को नकार दिया. मुझे नहीं लगता कि यही बात वे हमारे चुने गए जन-प्रतिनिधियों के बारे में लिखेंगे. आखिर चालीस- पचास  प्रतिशत लोग किसी को वोट नहीं  देते और जीतने वाला कुल मतों का बीस - पच्चीस प्रतिशत पाकर जीत जाता है तो फिर ये भी तो नकारे हुए हैं.

आरक्षण फ़िल्म को देखे बिना ही विवादित बना दिया गया है. इस फ़िल्म से आरक्षण पर कोई प्रभाव पड़ेगा, नहीं लगता. लेकिन नेता हैं कि दलितों का सबसे बड़ा हितैषी दिखने के लिए फ़िल्म का विरोध करने पर उतारू हैं. आरक्षण की इस व्यवस्था में  अल्पसंख्यकों को लाने से क्या प्रभाव पड़ेगा, उस पर ध्यान देने की आवश्यकता है. अब इस फ़िल्म में क्या है, देखने से ही पता चलेगा.

कश्मीर के अलगाव-वादी नेता (?)  अब तय करेंगे कि किसे  फाँसी हो  और किसे नहीं,  मीर वाइज उमर ने  एक बयान में कहा है कि अफजल को फाँसी होने पर परिणाम गंभीर होंगे.  मतलब भारत की सर्वोच्च संस्था पर हमला करने वाले को इसलिए फांसी न दी जाए कि मीर वाइज की ऐसी ही मर्जी है. ये तो राष्ट्रपति और संसद से भी बड़े हो गए. 

लखनऊ में  एक चाय वाले को एक मुस्लिम बच्चा मिला, जिसे उसने पाला-पोसा और मुस्लिम नाम ही रखा रहने दिया. उसने उस बच्चे के माँ-बाप को खोजा किन्तु वे नहीं मिले. कई वर्षों बाद उसकी माँ को पता   चला और अब उसने एक दलील यह भी दी है कि उस बच्चे को हिन्दू के यहाँ रहने पर सांप्रदायिक तनाव भी हो सकता है.

राहुल भैया, महाराष्ट्र के किसानों की छाती पर गोलियां चली हैं. उनपर भी नजर डालिए. वहां भी किसान मरे हैं, वे किसान जो सर्दी-गर्मी-बरसात झेलकर हमारा पेट भरते हैं.